आज का बचपन कल का भविष्य होता है। आधुनिक परिवेश में युवा वर्ग में मानवीय मूल्यों का ह्रास होकर उसकी मानसिकता समाज में सृजनात्मक न होकर विध्वंसक सोच होती जा रही है। समाज, परिवार व देश की रीढ़ युवा वर्ग होती है। युवा वर्ग वह नींव, आधारशिला व वर्तमान है, जो भविष्य का निर्माण करती है लेकिन जब नींव ही कमजोर हो जाने लगे तो स्वस्थ, सुंदर व संस्कारित समाज की कल्पना करना निरर्थक है। युवा वर्ग तूफानी नदी पर उस बांध के समान है, जो उस पानी से बंजर भूमि को भी उपजाऊ बना देता है, जिस पेड़ की जड़ें मजबूत होती है, वही पेड़ हरा-भरा रह सकता है। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ व चकाचौंध में युवा पीढ़ी के कदम लड़खड़ाने लगे हैं।
इस दूषित माहौल को बनाने में टीवी व सोशल मीडिया पर रील संस्कृति द्वारा परोसी जाने वाली अश्लीललता, अश्लील साहित्य व सामाजिक वातावरण की अहम भूमिका है। इसके साथ ही राजनीतिक, पारिवारिक व सामाजिक भूमिका को भी नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं। पारिवारिक दृष्टि से देखें तो अभिभावकों के पास अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं होता है, जिसके कारण बच्चों को भरपूर स्नेह, संरक्षण व मार्गदर्शन नहीं मिलता है, जिसकी परिणति यह होती है कि वह यही बातें बाहर तलाशने लगता है, जिसे वह अपने परिवार से प्राप्त करने में वंचित रहता है। यह वह स्थिति है कि जब अभिभावकों को पता चलता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। शिक्षा का व्यवसायीकरण को भी हम इसके लिए जिम्मेदार मान सकते हैं। युवा वर्ग की पैसों की भूख व उच्च महत्वाकांक्षा उसको गलत रास्ते के लिए प्रेरित करती है। पारिवारिक वातावरण में एकाकी प्रवृत्ति इतनी हावी हो चुकी है कि बच्चों के पास सब कुछ होते हुए खुद को अनाथ समझते हैं। आज अभिभावक यह कहकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं कि बेटे विदेश में रह रहे हैं लेकिन उनको उस गौरवशाली इतिहास का जब पता चलता है कि मां बाप में से किसी एक की मृत्यु पर दाह संस्कार भी विडियो काल पर ही देख लेते हैं लेकिन इस परिस्थिति के लिए हम खुद जिम्मेदार है क्योंकि हमने ही बच्चों को उन संस्कारों से पोषित नहीं किया है, जिसकी खाद व बीज एकाकी प्रवृत्ति है। टीवी व सोशल मीडिया की बात करें तो स्पष्ट नंगापन दिखाई देता है। संभ्रांत घर की महिलाएं इस तरह की रील बनाकर सोशल मिडिया पर डालती है, जिसकी हमारा सभ्य समाज मान्यता नहीं देता है। लव जिहाद जैसी कैंसर की बीमारी की जड़ भी सोशल मीडिया है। रील और रियल की जिंदगी में जब युवा वर्ग को भेद समझ में आता है तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है। युवा वर्ग को चाहिए कि उनको अपने परिवार, समाज व देश के प्रति कर्तव्यों को समझते हुए सुन्दर, सुसंस्कृत वैचारिक दृष्टि से अपनी प्रतिभा, क्षमता, बुध्दि व गरिमा का उपयोग इस तरह करें कि स्वच्छ, सुंदर व संस्कारित समाज का निर्माण हो सके।