वैसे तो झुन्झुनू जिले में गुटबाजी व धड़ेबाजी से शायद ही कोई अनभिज्ञ होगा। हालांकि पूर्व जिलाध्यक्ष बनवारी लाल सैनी के मृदुभाषी व मिलनसार स्वभाव के चलते इस गुटबाजी पर थोड़ी लगाम जरूर लगी थी लेकिन ज्यों ही एक महिला को जिलाध्यक्ष की कमान सौंपी गई, बहुत से महत्वाकांक्षी स्थानीय नेताओं के निजी स्वार्थ के चलते उनका मनोनयन रास नहीं आया। आज के इस घटनाक्रम ने उस पर मोहर लगा दी कि पिलानी विधानसभा के नेताओं को प्रदेश नेतृत्व का फैसला शायद अखर रहा है। चिड़ावा के सरकारी अस्पताल में आयोजित एक कार्यक्रम में चिड़ावा मंडल व पिलानी मंडल के संगठन के पदाधिकारी का नदारद रहना इस बात का संकेत है कि यह किसी स्थानीय नेता के इशारे पर हुआ है। विदित हो प्रोटोकॉल के तहत मंडल के पदाधिकारियों को आयोजन की शोभा बढानी थी लेकिन स्थानीय नेता की पुरानी अदावत के चलते उनके इस गुट ने इस आयोजन से दूरी बना ली। इतना ही नहीं अपने समर्थकों से मिडिया में तथ्यहीन बयान देकर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय भी दिया। ऐसा नहीं जिलाध्यक्ष हर्षिनी कुल्हरी के मनोनयन को लेकर प्रदेश प्रवक्ता ने सार्वजनिक रूप से प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया था, उसका परिणाम यह रहा कि प्रदेश प्रवक्ता को भाजपा से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। विदित हो स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को भी स्थानीय नेताओं ने राजनीति का अखाड़ा बनाकर छोड़ दिया। पिछले एक साल से चिड़ावा सरकारी अस्पताल के पीएमओ पद को फुटबाल बनाकर छोड़ दिया। इस गुटबाजी का खामियाजा विधानसभा चुनावों में भाजपा को भुगतना पड़ा था। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति ने भाजपा जैसे संगठन की पोल खोलकर रख दी है, जिसका भाजपा दंभ भरती रही है कि भाजपा एकजुट है। झुन्झुनू जिले में मचा यह घमासान को आगामी पंचायत व शहरी निकाय चुनावों में निश्चित रूप से खामियाजा भुगतना होगा। भाजपा प्रदेश नेतृत्व को इसको लेकर गंभीरता से सोचना होगा व स्थानीय नेताओं ने जयपुर मे अलग अलग पावर सैंटर के जरिये गुटबाजी को हवा दे रहे हैं, उस पर भी लगाम लगाने की तरफ इच्छा शक्ति से काम करना होगा। इसके साथ ही नवनियुक्त भाजपा जिलाध्यक्ष ने अपनी टीम की घोषणा नहीं की है और जैसे ही उनकी टीम की घोषणा होगी, वह टीम इस गुटबाजी की आग में घी का काम करेगी।
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