अचानक आई एक सरकारी मंजूरी ने खैरथल-तिजारा जिले की राजनीति में भूकंप ला दिया है। राजस्थान के मुख्यमंत्री ने खैरथल-तिजारा जिले का नाम बदलकर “भर्तृहरि-नगर करने और जिले का जिला-मुख्यालय भिवाड़ी रखने के प्रस्ताव पर सहमति दी है। इसे अब कैबिनेट, विधानसभा और फिर केन्द्र के गृह मंत्रालय से अंतिम मंजूरी मिलनी है। यह फैसला जितना प्रशासनिक दिखता है, उतना ही राजनीतिक भी है। स्थानीय लोग, विपक्ष और कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ता इसे सिर्फ “सांस्कृतिक सम्मान” बताकर बुझाने में भरोसा नहीं कर रहे। विपक्ष और कई स्थानीय नेताओं ने इसे राजनीतिक खेमा-बदली और वोटबैंक/भूमि-रुचि के हितों से जुड़ा कदम करार दिया है, जबकि सरकार का बहुत ही सतही तर्क है कि यह क्षेत्रीय-सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन को बढ़ावा देगा। राजस्व और कानून विभाग का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के पास गया और वह उसे मंज़ूरी दे चुके हैं। अब यह प्रस्ताव कैबिनेट, ततपश्चात विधानसभा और फिर केंद्र को भेजा जाएगा। इसी कड़ी से औपचारिक नाम-परिवर्तन और मुख्यालय-स्थानांतरण का रास्ता साफ होगा। यह वही प्रक्रिया है, जो अन्य जिलाई फेरबदल में अपनाई जाती रही है। भिवाड़ी, जो औद्योगिक-विकास और महानगर की सन्निकटता के कारण तेज़ी से उभरा शहर है, उसे जिले का मुख्यालय बताना प्रशासनिक नजरिये से तर्कसंगत तो दिखता है लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से कतई उचित नही है। मुंडावर के व्यक्ति को भिवाड़ी आने और जाने में नानी याद आ जाएगी। सुविधाएं, कनेक्टिविटी और निवेश के बहाने यह दावा किया जा रहा है। सरकारी बयानों में कहा गया है कि यह नाम-परिवर्तन और मुख्यालय-स्थानांतरण स्थानीय पर्यटन (भर्तृहरि से जुड़ा पर्यटन) और विकास को बढ़ावा देगा।
विरोधियों का कहना है कि असल कारण भू-राजनीति, चुनावी गणना, स्थानीय दबदबे और कुछ खास कारोबारी-समूहों के हित हैं। भिवाड़ी के चयन से विभाजन के पुराने मत-चिन्ह और संसाधन-वितरण पर असंतोष पैदा होगा। इन्हीं तर्कों को लेकर इलाके के कुछ विधायक और स्थानीय पंचायतें पहले ही सख्त हैं। क्षेत्रीय सासंद और तिजारा विधायक बालकनाथ बहुत समय से इस मुहिम में सक्रिय थे लेकिन इनको इस मकसद में कामयाबी मिल जाएगी, संशय है क्योंकि क्षेत्रीय जनता सड़को पर उतरने और आंदोलन करने पर उतारू है।
खैरथल-तिजारा की ग्रामीण और कस्बाई आबादी में यह भावना दिख रही है कि उनकी स्थानीय पहचान छिन रही है। खासकर खैरथल और तिजारा के लोगों में। कांग्रेस और अन्य स्थानीय नेताओं ने इस निर्णय को “जनहित से हटकर” और “धड़कन बदलने जैसा” करार दिया है। कुछ विधायक सामाजिक-मीडिया और क्षेत्रीय बैठकों में कड़े शब्दों में इसे खारिज कर चुके हैं। अगर जिला-मुख्यालय भिवाड़ी कर दिया गया, तो खैरथल-तिजारा के ग्रामीण क्षेत्रों को प्रशासनिक दूरी, कार्यालय-यात्रा-लागत और स्थानीय रोजगार पर असर पड़ सकता है। यह स्थानीय गुस्से को और हवा दे सकता है। कई अनौपचारिक स्रोत और स्थानीय राजनीतिक तर्क इस बदलाव के पीछे निम्नलिखित संभावित कारण गिनाते हैं। इनके जांच की आवश्यकता है और फिलहाल ये दावे जांच-योग्य हैं, विरुद्ध तथ्य नहीं।
*भू-हित और रियल-एस्टेट दख़ल* भिवाड़ी-रिम के भू-विकास और औद्योगिक भू-भूमियों की कीमतों में सीधे असर। (स्थानीय बाजारों में पहले से उठ रहे सवाल)।
*चुनावी रणनीति* आगामी चुनावी गणना के लिए वोट-बेस बदलना या नए वोट-ब्लॉक्स बनाना। (विरोधी नेताओं का आरोप)।
*प्रशासनिक केंद्रीकरण* संसाधन-वितरण और परियोजनाओं को भिवाड़ी-केंद्रित करना, जिससे ग्रामीण इलाकों का नुकसान हो सकता है। जाहिर है कि स्थानीय असंतोष राजनीतिक मोर्चे पर बढ़े। (स्थानीय नेताओं की आशंका)। भाजपा सहित क्षेत्रीय नेताओ को इस बदलाव के पीछे गहरे षड्यंत्र की बू आ रही है। नेताओ का तर्क है कि सरकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों को भर्तहरि से इतना ही लगाव है तो खैरथल के बजाय अलवर का नाम "भर्तहरि नगर" किया जाना चाहिए। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को शायद इतना तो पता अवश्य होगा कि तीर्थ स्थल भर्तहरि खैरथल के नही, अलवर के अधीन आता है। आरटीआई के जरिये इन तथ्यों और दस्तावेजो की जानकारी अवश्य मांगी जानी चाहिए ताकि क्षेत्र के 'असली हिमायतियो" के नाम उजागर हो सके। यह रिपोर्ट पूछती है कि असलियत जानने के लिए निम्न दस्तावेज और जानकारियाँ मांगी जानी चाहिए:
* राजस्व विभाग का प्रस्ताव (प्रस्ताव की तिथियाँ, कारण, लागत-अनुमान)।
* मुख्यमंत्री कार्यालय/गृह विभाग की मंजूरी की लिखित प्रतियाँ।
* कैबिनेट नोट और उससे जुड़े परामर्शी दस्तावेज।
* किसी भी इन्फ्रास्ट्रक्चर-या-डिवेलपमेंट प्रोजेक्ट से जुड़े एमओयू/निविदाएँ जिनका भिवाड़ी को मुख्यालय बनाने से सीधा लाभ होगा।
* क्षेत्रीय जनमत सर्वे/प्रस्ताव के समर्थन में लगने वाली सार्वजनिक परामर्श रिपोर्ट (यदि कोई)।
इन दस्तावेज़ों के लिए RTI/लोकल कोर्ट पिटिशन की सिफारिश की जाती है — ताकि तर्कसंगत और पारदर्शी सत्य सामने आए।