कलम को बंधक बनाने की नाकाम कोशिश

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान के झुंझुनूं जिला मुख्यालय पर एक मामले को लेकर जिले के पत्रकार व प्रशासन आमने सामने है। मुद्दा है कि जिला प्रशासन अपनी हठधर्मिता के चलते पत्रकारों के लिए आरक्षित स्थान से उनको बेदखल करने पर तुला हुआ है। यह वह स्थान है, जहां जिले के पत्रकार बैठकर यंत्रणा करने के साथ ही सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी आमजन तक पहुंचाने के साथ ही सरकार की जनविरोधी नीतियों भी उजागर करने के लिए मनन करते हैं। देखा जाए तो यह ईंटों से बना कोई भवन या कमरा नहीं बल्कि यह सरस्वती का मंदिर है, जहां सरस्वती पुत्र बैठकर अपने विचारों के आदान प्रदान के साथ ही अपनी निति का निर्धारण भी करते हैं लेकिन दुर्भाग्यवश सरस्वती के इस मंदिर को जिला प्रशासन की हठधर्मिता के चलते इसे एसीबी कार्यालय बनाने की कवायद चल रही है। प्रशासन का यह कदम पत्रकारिता पर हमले के साथ ही अलोकतांत्रिक व हिटलरशाही का प्रतीक है। क्या झुंझुनूं मुख्यालय पर यही स्थान है, जिसको लेकर जिला प्रशासन पत्रकारो के मौलिक अधिकारों का हनन करने पर तुला हुआ है। क्या प्रशासन की पत्रकारिता को बंधक बनाने की मंशा है लेकिन प्रशासन को यह आभास होना चाहिए कि भारत के विशाल हृदय व सुदृढ़ लोकतंत्र की पूरे विश्व में मिसाल दी जाती है। देश के लोकतंत्र के मजबूत स्तम्भ पत्रकारिता को जर्जर करने की मंशा को जिले के सामाजिक संगठनो, जिले के समस्त पत्रकारों व भारत के विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने स्तर पर ज्ञापन ओर प्रदर्शन कर इस बात का पूरजोर विरोध किया कि इसका अधिग्रहण कर एसीबी कार्यालय न बनाया जाए। इस मामले की गूंज जयपुर तक पहुंची, जो आला अधिकारी ने जयपुर से आकर पत्रकारों को आश्वस्त किया कि निश्चित रूप से पत्रकारों की आवाज को तवज्जो दी जायेगी लेकिन जिले के सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों, संगठन के नेताओं का इस मामले को लेकर आचरण संदेह के घेरे में है। भारतीय जनता पार्टी के किसी भी विधायक व संगठन में बैठे नेताओं ने इस मामले को लेकर चुप्पी साध रखी है। हर आयोजन व आमसभा में मिडिया के बंधुओं का उचाव करने वाले इन नेताओं का बंधुत्व क्या दिखावा मात्र था। सच का साथ देना और सच से रुबरू होना चाहिए और आज सच्चाई यही है कि प्रशासन हिटलरशाही पर तुला हुआ है। स्थानीय सत्ता पक्ष के जन प्रतिनिधियों व संगठन के नेताओं की चुप्पी को लेकर महाभारत का द्रोपदी के चीर हरण का प्रकरण आंखों के सामने आता है कि भीष्म पितामह भी उतने ही दोषी थे, जितना दुस्साहस व दुर्योधन दोषी था क्योंकि भीष्म पितामह ने उसका विरोध नहीं किया। अतः इस प्रकरण को लेकर इतिहास इन जन प्रतिनिधियों को भीष्म पितामह की भूमिका के लिए याद करेगा कि जब पत्रकारिता का चीरहरण हो रहा था तो वे मौन रहकर तमाशाबीन बने खड़े थे। कलम को बंधक बनाने को लेकर कांग्रेस जो अंजाम भुगत चुका है, उसको याद रखना होगा। इन नेताओं को यह भी समझना होगा कि सत्ता किसी की बपौती नहीं। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता अंकों का खेल होती है और अंक बदलने की चाबी देश के आवाम के हाथ में है, यह बात इन जनप्रतिनिधियों को भली-भांति जान लेना चाहिए।

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