लोकतंत्र में असहमति के स्वरों को दबाना कितना उचित

AYUSH ANTIMA
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लोकतंत्र में असहमति के स्वरों को उचित स्थान प्रदान करने की परम्परा रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का तकाजा है कि विपक्ष की आवाज को भी उतना ही महत्व दिया जाए, जितना सत्ता पक्ष को। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का न होना निरंकुश शासन व्यवस्था को जन्म देता है। भारत के भूतकाल के राजनीतिक पटल पर हम इंदिरा गांधी का निरंकुश शासन की परिणिति आपातकाल के रूप में देख चुके हैं। यह वह दौर था कि विपक्ष की आवाज को दबा दिया गया, यहां तक कि पत्रकारिता का भी गला घोंट दिया गया। उस काल के बाद एक नई क्रांति का संचार हुआ था, जिसके प्रेरणास्रोत जयप्रकाश नारायण थे। जेपी आंदोलन ने कांग्रेस शासन की चूले हिलाकर रख दी। उस जन आंदोलन ने उस निरंकुश शासक इंदिरा गांधी को पदच्युत कर दिया था, जिसकी कभी तूती बोलती थी। आज संसद की गरिमा गिराने व संवैधानिक पदों पर प्रहार हो रहे हैं। संसद का सुचारू रूप से संचालित करने में विपक्ष के साथ साथ सत्ता पक्ष की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। असहमति के स्वरों को अब सरकार सुनने की आदी नहीं रही, यही कारण है कि सांसदों का थोक के भाव निलंबन हो रहा है। असहमति का स्वर व्यक्तिगत दुश्मनी का रुप लेने लगा है। देश‌ का सर्वोच्च पद राष्ट्रपति व उप राष्ट्रपति के पदों पर भी सुनियोजित तरीके से प्रहार हो रहा है। अमूमन जब किसी नेता के यहां भ्रष्टाचार को लेकर छापेमारी होती है तो एक ही शब्द सुनने को मिलता था कि लोकतंत्र पर खतरा है लेकिन जो अमर्यादित व्यवहार विपक्ष की तरफ से और सत्तापक्ष की ओर से हठधर्मिता देखने को मिल रही है, सही मायने में यही व्यवहार लोकतंत्र पर गंभीर खतरा है। उप राष्ट्रपति का पद किसी पार्टी, जाति या धर्म पर आधारित नहीं होता लेकिन इसको जातिवाद की सीमाओं में बांधने का काम हो रहा है। निश्चित रूप से विपक्ष के उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड के प्रति जो असम्मान जनक व्यवहार देखने को मिला था, वह नैतिकता के मूल्यों में गिरावट की पराकाष्ठा थी। विपक्ष के इस व्यवहार को किसी भी दृष्टि से संसदीय प्रणाली के अनुरूप नहीं ठहराया जा सकता। वर्तमान मे जिस तरह से जगदीप धनखड़ ने त्यागपत्र दिया, वह भी हमारी संसदीय प्रणाली और लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह खड़े करने वाला प्रकरण है लेकिन इस प्रकरण के बाद जो राजनीति हो रही है, उसको भी उचित नहीं कहा जाएगा। संसद का सुचारू रूप से संचालन न होने के लिए विपक्ष को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि संसद के सुचारू रूप से संचालन में सत्तापक्ष की भी जिम्मेदारी है। सत्तापक्ष को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि सत्ता उनकी बपौती है। संसद में जो नजारा देखने को मिल रहे हैं, उनसे यही प्रतीत होता है कि भारतीय लोकतंत्र में असहमति के स्वरों के लिए कोई स्थान नहीं है।

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