साथी! सावधान ह्वै रहिये, पलक मांहिं परमेसुर जाणे, कहा होइ कहा कहिये॥ बाबा बाट घाट कुछ समझ न आवै, दूर गवन हम जानां। परदेशी पंथी चलै अकेला, औघट घाट पयानां॥ बाबा संगि न साथी कोइ नहिं तेरा, यहु सब हाट पसारा। तरवर पंखी सबै सिधाये, तेरा कौंण गंवारा॥ बाबा सबै बटाऊ पंथि सिरानैं, अस्थिर नहीं कोई। अन्तकाल को आगें पीछे, बिछुरत बार न होई॥ बाबा, काची काया कौन भरोसा, रैन गई क्या सोवै। दादू संबल सुकृत लीजै, सावधान किन होवै॥
अर्थातः हे मेरे साथी ! तू सावधान हो जा। पता नहीं कि अगले क्षण में क्या होने वाला है ? इस विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ। भगवान् ही जानें। हे तात ! तुमको बहुत दूर जाना है। मार्ग में काम क्रोध आदि शत्रु बैठे हैं, उनको जीतने का उपाय भी तुम नहीं जानते हो। हे जीव ! तू परदेशी है, अकेला है। तू उन दुर्गम शत्रुओं को कैसे जीत सकेगा ? स्त्री- पुत्रादिकों के मध्य तेरा कोई साथी भी नहीं दिखता। उनमें आस्था भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि इस संसार में कोई भी पदार्थ पारमार्थिक सत्यवाला नहीं है। जगत् का व्यवहार भी मिथ्या होने से केवल ठग रूप ही है। जैसे पक्षीगण सायंकाल वृक्ष पर आकर बैठ जाते हैं और प्रात: होने पर आकाश में उड़ जाते हैं, ऐसे ही कुटुम्बी जन भी तेरे को छोड़कर चले जायेंगे। हे मूर्ख मन ! तू बता तो सही,इनमें तेरा कौन है? सभी रस्ते चलने वाले हैं। इनमें कोई भी स्थिर रहने वाला नहीं है। भाई बन्धु तो मोह जाल में बाँधने वाले बन्धन रूप ही हैं। उनसे प्रेम करना भी एक रोग ही है। उनका संयोग भी वियोग से ग्रस्त ही है। जैसे वृक्ष का पत्ता वृक्ष से अनायास ही गिर जाता है, वैसे ही यह शरीर भी बिना प्रयास के ही गिर जायगा। जैसे शरद् ऋतु के बादलों में बिजली की चकाचौंध में गन्धर्व नगर में किसी ने स्थिरता देखी हो तो वह इस शरीर में भी स्थिरता को देखे। आयु भी फूटे घड़े में जल की तरह प्रतिक्षण क्षीण हो रही है। अत: सत्कर्म करके पुण्य उपार्जित करो, यह ही तुम्हारे साथ में जाने वाला है। योगवासिष्ठ में लिखा है कि-जो यह संसार का विस्तार है, इसमें क्या सुख है ? कुछ भी तो नहीं। चर, अचर प्राणियों के चेष्टा के विषय तथा केवल वैभवकाल में ही रहने वाले जितने भोग के साधन हैं, वे सब के सब अस्थिर हैं आपत्तियों के स्वामी अर्थात् आपत्ति में डालने वाले तथा पापरूप हैं। जैसे मरीचिका में जल न होने पर भी भ्रम से उसे जल समझकर उसके द्वारा मोहित हुए मृग वन में बड़ी दूर तक खिंचे चले जाते हैं। उसी प्रकार मूढ-बुद्धि वाले लोग संसार के पदार्थों में सुख न होने पर भी उनमें सुख मान लेते हैं और उसी सुख के लोभ से आकृष्ट होकर इधर-उधर भटकते रहते हैं। यद्यपि हम बिके हुए नहीं हैं तथापि बिके हुए की तरह परवश हो रहे है। यह सब माया का खेल है, इस बात को जानते हुए भी सब लोग मूढ बने बैठे हैं। इस माया से मुक्त होने का कोई उपाय नहीं करते। यह कितने दुःख का विषय है। संसार के इस प्रपञ्च में जो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण भोग दिखाई देते हैं। ये क्या हैं ? इस पर विचार करना चाहिये। सब लोग व्यर्थ ही इनके मोह में पड़कर भ्रान्तिवश अपने को बद्ध मान कर बैठे हैं, जैसे गड्ढे में गिरा हुआ मृग दीर्घकाल के बाद यह जानता है कि मैं गड्ढे में गिरा हूँ। वैसे ही लोगों ने भी बहुत समय के बाद यह जाना है कि हम मूढ बनकर व्यर्थ में ही मोह में पड़े हैं।