झालावाड़ की एक सरकारी स्कूल के दर्दनाक हादसे से सारा देश स्तब्ध व निशब्द है। करीब आधे दर्जन घरों के चिराग सरकारी स्कूल के जर्जर भवन के नीचे दबकर बुझ गये। देखा जाए तो जब भी देश या प्रदेश के किसी भाग में ऐसी दर्दनाक, हृदयविदारक दुखद घटना होती है तो जनता की आवाज उठती है। जांच कमेटी बैठेगी, सख्त कार्रवाई होगी, कानून अपना काम करेगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, जैसी घोषणाएं करके जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि देश व प्रदेश में सरकार नाम की चीज भी है, जो आवाम के प्रति संवेदनशील है। समय बीतने के बाद लोग भूल जाते हैं और जिंदगी आगे बढ़ जाती है। इस बीच राजनीति बदलने के साथ ही राजनेता भी बदल जाते हैं। इसके साथ ही हम भारतीय होने का गर्व महसूस करते हैं। यह देश विश्व गुरू बनने की उत्कट इच्छा पाले हुए हैं। भारत को विश्व की तीसरी शक्ति बनाने के दावे राजनेताओं द्वारा सुनने को मिलते हैं लेकिन देश मूलभूत सुविधाओं को लेकर तरस रहा है। झालावाड़ की सरकारी स्कूल, जो जर्जर अवस्था में थी, जिसको लेकर शिक्षा विभाग व स्थानीय प्रशासन निद्रा में था। उनकी निद्रा ने उन मासूमों को सदैव चिरनिद्रा में भेज दिया, जिनका केवल इतना ही कसूर था कि उस सरकारी स्कूल के छात्र थे। इस घटना को लेकर प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रीयो व राजस्थान के मुख्यमंत्री ने गहरी संवेदना व्यक्त करके अपने नैतिक दायित्व की इतिश्री कर ली लेकिन आखिर इस जर्जर सिस्टम का जिम्मेदार कौन है, इसको लेकर सारा सरकारी सिस्टम मौन है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कुछ अध्यापकों व प्रधानाध्यापक को निलंबित कर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर लिया लेकिन क्या शिक्षा मंत्री मदन दिलावर इस दुखांतिका की नैतिक जिम्मेदारी लेकर सरकार से हटने का फैसला करेंगे ?
इस देश में मूलभूत सुविधाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई व्यवस्था, सड़कें, अस्पताल, महंगाई को लेकर सरकार से सवाल करना अपराध की श्रेणी में आने लगा है। युवा वर्ग को धर्म की अफीम चटाकर इस कदर भ्रमित कर दिया है कि यदि सनातन धर्म बचा है तो उन्हीं की वजह से बचा हुआ है। राजस्थान की डबल इंजन सरकार की बात करें तो जिसको विपक्षी दल पर्ची की सरकार से संबोधित करता है, केवल आंकड़ों की सरकार बनकर रह गई है। रोजाना मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा सोशल मिडिया पर सरकार के गुणगान करने वाली पोस्ट डालकर प्रदेश को विकास की गाड़ी में बैठने का दावा करते हैं। तत्पश्चात उसी पोस्ट को शेयर करने की होड़ लग जाती है व सोशल मिडिया को देखकर ऐसा लगता है कि आजादी के बाद विकास को लेकर संवेदनशीलता का प्रदर्शन करने वाली पहली सरकार है। सूत्रों की मानें तो हजारों सरकारी स्कूलों के भवन जर्जर अवस्था में है और सरकार इनको ठीक न करवाकर शायद झालावाड़ जैसे दर्दनाक हादसे का इंतजार कर रही है। जब सरकार के पास भवन नहीं है तो आखिर राजनीतिक दबाव में थोक के भाव नये स्कूलों की घोषणाएं क्यों करती है। देखा जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में न तो पर्याप्त निवेश हो रहा है और न ही सरकारी स्कूलों में व्यवस्था ठीक हो पा रही है। जब तक सरकारी स्कूलों में राजनीतिक हस्तक्षेप रहेगा, शिक्षा में सुधार व गुणवत्ता की आशा करना बेमानी होगा। भले ही झालावाड़ की घटना को लेकर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर जिम्मेदार न हो लेकिन उनकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि अपने पद का त्याग कर मिसाल कायम करें। क्या उस सरकारी स्कूल का निरिक्षण करने शिक्षा विभाग के आला अधिकारी व उच्च अधिकारी नही गये ? क्या उनको भवन का जर्जर होना नहीं दिखाई दिया ? यदि दिखाई भी दिया होगा तो उनके बच्चे तो प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं, जहां क्लाश रूम एसी है। निश्चित रूप से ऐसी घटनाएं उस जर्जर की देन है, जिसमें आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। यह भवन जर्जर नहीं था बल्कि वह सरकारी सिस्टम जर्जर था, जिसकी वजह से उन नौनिहालों को मौत का ग्रास बनना पड़ा ।