जयपुर: ड्यूचेन मस्कूलर डिस्ट्रोफी (डीएमडी) एक अत्यंत गम्भीर आनुवांशिक बीमारी है। इस बीमारी से ग्रसित बच्चे 8 से 11 वर्ष की उम्र के बीच ही व्हीलचेअर पर आ जाते हैं। भारत में कहीं भी इस बीमारी का कोई ठोस ईलाज नहीं। यह जानकारी श्रीश्री 1008 महामंडलेश्वर डॉ.अनीता योगेश्वरी गिरी ने प्रेसवार्ता कर पत्रकारों को दी। उन्होंने बताया कि इस बीमारी से ग्रसित बच्चे अपनी दैनिक क्रियाएं तक नही कर पाते। ऐसे बच्चे के माता पिता ही इनकी सेवा करते हैं और नित्य क्रियाएं भी उनके द्वारा ही कराई जाती है। यहाँ तक कि अगर इस बीमारी से पीड़ित बच्चे के शरीर पर मक्खी, मच्छर बैठ जाए तो ऐसे बच्चे उन्हें हटा भी नहीं सकते। उन्होंने कहा कि बड़े दुर्भाग्य की बात है कि ड्यूचेन मस्कूलर डिस्ट्रोफी (डीएमडी) पीडित बच्चों के माता पिता हर दिन इस दर्दनाक बीमारी से ग्रसित अपने बच्चे को जूझते देखते हैं लेकिन कुछ कर नहीं सकते। इस बीमारी से बच्चों के शरीर की मांसपेशियों में कमजोरी आ जाती है। उन्होंने बताया कि इस गम्भीर बीमारी से भारत देश में हजारों बच्चे ग्रस्त हैं। भारत में इस जेनेटिक बीमारी से पीड़ित प्रत्येक 10 बच्चों में से 8 बच्चों की मृत्यु 20 वर्ष की आयु तक हो जाती है। प्रेसवार्ता के दौरान डॉ.अनिता योगेश्वरी गिरी ने राजस्थान और केन्द्र सरकार से अपील करते हुए कहा है कि सरकार बच्चों के इस दर्द को समझे और बच्चों की इस पीड़ा का अहसास करते हुए इस भयंकर बीमारी के इलाज के लिए अतिशीघ्र कोई ठोस कदम उठाए। उन्होंने बताया कि भारत में इस बीमारी का अभी तक कोई ठोस उपचार विकसित नहीं किया जा सका है। डीएमडी बीमारी से ग्रसित बच्चे अपनी सभी दैनिक क्रियायें जैसे शौच जाना, नहाना, कपड़े पहनना, भोजन करना इत्यादि सभी क्रियाएँ अपने माता-पिता की मदद से ही कर पाते हैं। यहाँ तक कि ऐसे बच्चे खुद के शरीर से मच्छर-मक्खी हटाने में भी असक्षम होते हैं।
*राजस्थान में लगभग 550 बच्चे डीएमडी से ग्रसित*
मस्कुलर डिस्ट्रोफी वेलफेयर सोसाइटी राजस्थान के राष्ट्रीय संयोजक रामगोपाल शर्मा ने पत्रकारों को बताया कि अकेले राजस्थान में ही डीएमडी बीमारी से लगभग 550 बच्चे ग्रसित हैं। उन्होंने बताया कि वह विगत 15 वर्षों से लगातार डीएमडी बीमारी से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार से मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे बच्चों के पेरेंट्स हमेशा डरे हुए रहते हैं कि कब उनका बेटा या बेटी इतनी कम उम्र में ही एक दिन उनका साथ छोड़कर चला जाएगा। ऐसे बच्चों के पेरेंट्स का ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि जहां उनको अपने बच्चों से सहारे की आशा रहती है और उनके मां-बाप बच्चों से कई उम्मीदें लगाए रहते हैं जबकि उनकी उम्मीदें एक दिन दहशत में बदल जाती हैं जब उनका बच्चा उनका साथ छोड़कर दुनिया से चला जाता है। विकसित देशों में इस बीमारी का ईलाज उपलब्ध है लेकिन बहुत ही महंगा ईलाज होने के कारण आमजन की पहुंच से कोसों दूर है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चों को किसी तरह की दवा से कोई फायदा नहीं होता है। इसका एकमात्र और सर्वमान्य ईलाज जेने थैरेपी है, जो केवल अमेरिका, कनाड़ा और दुबई जैसे विकसित देशों में ही उपलब्ध है।