संगठन में ही शक्ति निहित है: असंगठित समाज व निजी स्वार्थ से वशीभूत मुखिया किसी भी समाज के लिए घातक है

AYUSH ANTIMA
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संगठन से बड़ी कोई शक्ति नहीं है। बिना संगठन के कोई भी देश या समाज सुचारू रुप से चलकर प्रगति नहीं कर सकता है। किसी भी संगठित देश का प्रारंभिक घटक परिवार, उसके बाद समाज व तत्पश्चात देश का नंबर आता है। अतः देश को संगठित करने के लिए पहले परिवार व फिर समाज को संगठित करना होगा क्योंकि संगठन ही समाज व परिवार की अमोध शक्ति है और विघटन समाज के लिए घातक है। खंड खंड भागों में विभक्त समाज कभी भी प्रगति नहीं कर सकता है। आपसी फूट किसी भी समाज को विनाश की ओर धकेल देती है। संगठन प्रगति का प्रतीक है, जो समाज संगठित रहता है, वहां सदैव सुख व शांति का वास करता है। इसलिए ही कहा गया है कि 1000 विघटित व्यक्तियों का समूह से 10 व्यक्तियों का संगठित समूह श्रेषठ होता है। वर्तमान समय में हर समाज में सामाजिक संगठनों की बाढ देखने को मिल रही है लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह सामाजिक संगठन समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। जब किसी समाज का मुखिया यह चाहता है कि वह आजीवन पद पर बना रहे, वह समाज के लिए ख़तरनाक है। वह व्यक्ति अपनी कुर्सी को सुरक्षित रखने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति का अनुसरण करने में नहीं हिचकिचाता है और आजीवन कुर्सी पर बने रहकर अपनी वाहवाही लूटने की फिराक में रहता है लेकिन उसने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उसकी इस स्वार्थ की भावना से समाज को कितना नुकसान हो रहा है। ऐसे व्यक्तियों को चाहिए कि वह अपनी नीति और नियती में सुधार करें, यदि वे वास्तव में समाज हित के प्रति समर्पण भाव रखते हैं। ऐसे प्रवृत्ति के व्यक्ति समाज के लिए दीमक का काम करते हैं और समाज को खोखला करने में इनका विशेष योगदान रहता है। इसको लेकर समाज के युवा व बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आना होगा व इस दीमक को निष्क्रिय करना ही समाज हित है। जब तक किसी समाज का मुख्य बिंदु यानी मुखिया बिना अपने निजी स्वार्थ के हितों का त्याग नही करेगा तो उस समाज के संगठन का बंटाधार निश्चित है। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर पर समाज के प्रति पूर्ण समर्पण से समाज हित में लगे हुए हैं लेकिन निचले स्तर पर भी ऐसे समर्पण भाव वाले व्यक्तियों को तवज्जो देनी होगी। निजी स्वार्थ वाले व्यक्तियों के कारण युवा व बुद्धिजीवी वर्ग उस संगठन से किनारा कर लेते हैं, जो किसी भी समाज के लिए घातक है। 
युवा पीढ़ी किसी भी समाज की रीढ़ होती है। इसलिए युवा पीढ़ी को अपने समाज के प्रति दायित्वों का निर्वहन करने को लेकर आगे आना होगा। रामसेतु निर्माण में गिलहरी के योगदान को भी कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि उसकी इच्छा शक्ति व भावना को सलाम करना चाहिए। उसी तरह गिलहरी के योगदान की भावना से प्रेरणा लेकर समाज की विचारधारा से जुड़ना होगा। यह मत सोचो की समाज ने हमें क्या दिया बल्कि हमारी यह सोच होनी चाहिए कि हम समाज को क्या दे सकते हैं। इसलिए युवा पीढ़ी को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करते हुए समाज हित में आगे आना ही होगा ।

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