सोशल मिडिया पर फूहड़ता

AYUSH ANTIMA
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आज हमे सनातन धर्म की बहुत बड़ी बड़ी बाते सुनने को मिलती है। देखा जाए तो सनातन समाज में रिश्तों का ताना-बाना अत्यन्त गहरा, व्यवस्थिति और शाश्वत माना गया है, जो केवल रक्त संबंधों तक ही सिमट कर नहीं रह गया बल्कि संस्कारों और कर्तव्यों पर आधारित है। भारतीय संस्कृति परिवार पर केन्द्रित रही है, जहां व्यक्ति की पहचान उसके वंश और संस्कारों से होती है। संस्कार विहीन समाज और सनातन का गहरा संबंध है क्योंकि सनातन धर्म केवल पूजा पद्धति नहीं बल्कि जीवन जीने और रिश्तों की पवित्रता को लेकर एक शाश्वत पद्धति है। जब समाज संस्कारों से दूर होता है या उसे दूर करने का काम किया जाता है तो वह न केवल अपनी संस्कृति, बल्कि नैतिक पतन की और अग्रसर होता है। सोशल मिडिया पर परोसी जा रही फ़ूहड़ कामेडी हमारे सभ्य समाज को खासकर युवा पीढ़ी को सनातनी संस्कारों से विमुख कर रही है। टीआरपी और न्यूज के चलते कामेडी अपने निम्न स्तर पर पहुंच चुकी है। इस तरह के परोसे जा रहे कंटेंट में भद्दे चुटकले, द्विअर्थी संवाद और अश्लीलता आम बात हो गई है। भारतीय संस्कृति व सनातन संस्कृति में पारिवारिक रिश्ते मर्यादित और प्रगाढ़ होते हैं। रामायण काल में भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम जो हर सनातनी के आराध्य हैं, वो बाप-बेटे, मां-बेटे, भाई-भाई व देवर-भाभी के रिश्ते हमारे लिए नजीर है। सीता और लक्ष्मण के देवर भाभी के रिश्ते में जो अपनत्व और मर्यादा थी, उसको तार तार करने वाले फ़ूहड़ प्रसंग और कामेडी सोशल मीडिया पर परोसी जा रही है। मशहूर कामेडियन शेखर सुमन ने इस फूहड़ता से आहत होकर कामेडी कार्यक्रमों से दूरी बना ली थी। शेखावाटी अंचल में भी बहुत से महानुभाव है, जिन्होंने इस फूहड़ता को ही कामेडी मान लिया है। चाचा, चाची, ताऊ, भाभी के रिश्तों का उपहास उड़ाया जा रहा है। शराब को लेकर व शराब के ठेको पर कामेडी करना समाज को क्या संदेश देना है, यह समझ से परे है। देवर भाभी को लेकर अश्लील संवाद इस बात का संकेत है कि उनकी सामाजिक चेतना शून्य होने के साथ ही संवेदनाएं मर चुकी है। साहित्य किसी समाज का दर्पण होता है और उच्च कोटि के साहित्य से समाज के युवा वर्ग को दिशा दी जा सकती है लेकिन यह भी देखा गया है कि मां सरस्वती के मंचों से भी भद्दे चुटकले ही साहित्य की श्रेणी में आने लगे हैं। साहित्य का युवा वर्ग पर गहरा प्रभाव पड़ता, इसको लेकर सोशल मीडिया पर जो फूहड़ता परोसी जा रही है, सरकार को संज्ञान लेकर इसको रोकने के लिए प्रभावी कानून के साथ उसकी परिपालना की जरूरत है।

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