कोटपूतली (बिल्लूराम सैनी): क़स्बा स्थित राजकीय बीडीएम जिला चिकित्सालय को वर्ष 2019-20 में जिला अस्पताल का दर्जा तो मिल गया, लेकिन सात साल बाद भी अस्पताल को उस स्तर का चिकित्सकीय और नर्सिंग स्टाफ नहीं मिल पाया है। स्थिति यह है कि स्टाफ की कमी के चलते कई बार मामूली दुर्घटनाओं में घायल मरीजों को भी जयपुर रैफर करना पड़ता है। ऐसे में जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं और सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अस्पताल में चिकित्सकों के 52 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 42 चिकित्सक ही कार्यरत हैं। ईएनटी और मनोरोग विशेषज्ञ सहित 10 चिकित्सकों के पद रिक्त पड़े हैं। वहीं सीनियर नर्सिंग ऑफिसर के 23 पदों में से मात्र 17 पर कार्मिक कार्यरत हैं, जबकि नर्सिंग अधीक्षक के दोनों पद खाली हैं। नर्सिंग ऑफिसर के 59 स्वीकृत पदों में भी केवल 52 पद ही भरे हुए हैं। जिला चिकित्सालय में प्रतिदिन करीब 3200 मरीजों की ओपीडी और 120 मरीजों की आईपीडी रहती है। अस्पताल में 48 विभाग संचालित हैं तथा केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं का संचालन भी यहीं से किया जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित होने के कारण दुर्घटना पीड़ित मरीजों का अतिरिक्त भार भी इसी अस्पताल पर पड़ता है। यहां आपातकालीन सेवाओं के साथ ट्रॉमा सेंटर भी संचालित है, जिससे स्टाफ की आवश्यकता और बढ़ जाती है। वर्ष 2019 में अस्पताल को 250 बेड क्षमता का किया गया था और उसी दौरान इसे जिला अस्पताल का दर्जा भी मिला लेकिन उसके अनुरूप स्टाफ में बढ़ोतरी नहीं की गई। बढ़ती मरीज संख्या और विस्तारित सेवाओं के बीच सीमित स्टाफ पर कार्य का दबाव लगातार बढ़ रहा है।हालांकि स्टाफ की कमी के बावजूद अस्पताल का चिकित्सा एवं नर्सिंग स्टाफ बेहतर सेवाएं देने का प्रयास कर रहा है। उपलब्ध संसाधनों के बीच मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है तथा अस्पताल में आधारभूत सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर में भी कई नवाचार किए गए हैं। अस्पताल के पीएमओ डॉ.पुष्कर राज गुर्जर ने बताया कि स्टाफ की कमी के कारण कुछ परेशानियां अवश्य हैं, लेकिन मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए पूरा स्टाफ पूरी निष्ठा से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि रिक्त पदों की जानकारी उच्च अधिकारियों को भेजी जा चुकी है तथा स्थानीय विधायक हंसराज पटेल भी इस संबंध में लगातार प्रयासरत हैं। कोटपूतली के जिला अस्पताल में बढ़ते मरीज भार और रिक्त पदों को देखते हुए अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकार स्टाफ की कमी को कब दूर करेगी। यदि जल्द भर्ती नहीं हुई तो जिला अस्पताल का दर्जा केवल कागजों तक सीमित रह जाने का खतरा बना रहेगा।
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