ज्यों ही गर्मी के मौसम की शुरुआत होती है, वैसे ही पानी की गंभीर समस्याओं को लेकर आक्रोश व आंदोलन देखने को मिलते हैं। देखा जाए तो पानी की समस्या अब मौसमी न होकर स्थायी हो गई है। यह समस्या प्रकृति से जुड़ी न होकर मानव निर्मित भी है। घटता जलस्तर, कुप्रबंध व प्राकृतिक जल स्रोतों का ठीक से रख रखाव न होना भी इसके मुख्य कारण है। इसके साथ ही वन संपदा का विलुप्त होने के साथ ही शेखावाटी की लाईफ लाईन काटली नदी के बहाव क्षेत्र के रास्ते में अतिक्रमण और भूमाफियाओ का कब्जा होना भी है। अरावली श्रृंखला में अवैध खनन होने के साथ ही पहाड़, जो वर्षा लाने में सहायक होते थे, पठार का रूप ले रहे हैं। पीने के पानी की समस्या कोई सौ वर्षों में नहीं बनी है। मुझे याद है नब्बे के दशक में कुओं पर नहाना और मवेशियों के लिए पीने के पानी की उपलब्धता थी। जनसंख्या बढ़ने के साथ ही भूमि सिकुड़ने लगी। उस काल खंड में खुले कच्चे मैदान और घऱो में गुलाड़ भी कच्चे होते थे, जो बरसात के पानी को सोख कर जलस्तर बढ़ाने में सहायक थे। इस पीढ़ी ने कुओं में व मवेशियों के लिए बनी खेल में पानी देखा तत्पश्चात अब बोतल में भी देख रहे है, यदि यही हालात रहे तो लोगों के आंखों का पानी भी सूख जायेगा। अतीत काल खंड में शेखावाटी के भामाशाहों ने पानी की प्राथमिकता को देखते हुए अनेको कुएं, बावड़ी व तालाबों का निर्माण करवाकर समाज को समर्पित किए। राजस्थान सरकार प्राकृतिक जल स्रोतों के रख रखाव को लेकर गंगा वंदे कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। इसके लिए करोड़ों रुपये के बजट का आवंटन हुआ है लेकिन यह आयोजन एक इवेंट बनकर रह गया है। नेता इसको लेकर फोटो सेशन कर आयोजन की इति श्री कर लेते हैं। एक तगारी व झाड़ू हाथ में लेकर फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डालना ही इस अभियान को पूरा होना मान रहे हैं। जो करोड़ों रूपयों का बजट आवंटित हुआ है, उसको अफसरशाही बंदरबांट कर लेती है। पर्यावरण को लेकर पिछले वर्ष भी एक पेड़ मां के नाम अभियान ने अखबारों की कतरनों में खूब सुर्खियां बटोरी थी लेकिन यथार्थ के धरातल में काम हुआ यह सर्व विदित है। पिछले दिनो गृह जिले मंड्रेला में केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री व मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के आतिथ्य में प्रवासी भामाशाहों ने एक आयोजन किया था, जिसमें हर घर व खेत में निशुल्क टांके बनाने को लेकर सहमति बनी और दावे भी किए गये लेकिन धरातल पर कुछ भी दिखाई नहीं दिया। खैर दावे और वादे तो जनता को भ्रमित करने के लिए ही किए जाते हैं और इस मिशन में यह आयोजन कामयाब भी रहा। सवाल यह नहीं है कि कारवां क्यों लूटा लेकिन सवाल यह है कि कारवां किसने लूटा। हमें आने वाली पीढ़ी को पीने के पानी की व्यवस्था मिले, इसको लेकर गंभीरता से प्रयास करने होंगे क्योंकि जल है तो कल है। रहीम ने अपने दोहे में पानी के महत्व को बड़े सही ढंग से समझाया है -
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गये न उबरे, मोती, मानस, चून।।