स्टिंग में फंसे विधायक दोषी हैं या निर्दोष, अनुशासन समिति क्यों है खामोश

AYUSH ANTIMA
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जयपुर: दैनिक भास्कर के स्टिंग ऑपरेशन में विधायक निधि के कार्यों में कथित कमीशनखोरी का मामला सामने आने के बाद राजस्थान की राजनीति में खलबली मच गई थी। कैमरे पर हुई बातचीत ने न केवल तीन विधायकों को सवालों के घेरे में खड़ा किया, बल्कि विधायक निधि के उपयोग की पूरी व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया। मामला विधानसभा तक पहुंचा और विधानसभा अध्यक्ष ने इसे अनुशासन समिति को सौंप दिया। उस समय माना जा रहा था कि शीघ्र जांच होगी और दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा लेकिन हुआ इसका उल्टा। स्टिंग को हुए कई महीने गुजर चुके हैं, मगर अनुशासन समिति की रिपोर्ट अब तक सामने नहीं आई। यह स्थिति अब स्वयं में एक बड़ा सवाल बन चुकी है। आखिर समिति किस निष्कर्ष पर पहुंची, जांच पूरी हुई या नहीं, यदि हुई तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही और यदि नहीं हुई तो इतने लंबे समय में समिति आखिर कर क्या रही थी। इन सवालों का जवाब न सरकार के पास दिखाई दे रहा है और न विधानसभा के पास। सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब बहस स्टिंग से ज्यादा उस चुप्पी पर होने लगी है, जिसने पूरे मामले को घेर रखा है क्योंकि लोकतंत्र में आरोप लगने से ज्यादा गंभीर स्थिति तब पैदा होती है, जब आरोपों की जांच अनिश्चितकाल तक लटकी रहे। जनता के मन में एक सीधा और स्वाभाविक सवाल है। जिन तीन विधायकों के नाम इस पूरे विवाद में सामने आए, वे आखिर निर्दोष हैं या दोषी। यदि निर्दोष हैं तो उन्हें अब तक क्लीन चिट क्यों नहीं मिली और यदि प्रथम दृष्टया आरोप सही पाए गए हैं तो कार्रवाई का रास्ता क्यों नहीं अपनाया गया।
निर्दलीय विधायक ऋतु बानावात ने भी इसी सवाल को नए सिरे से उठाते हुए सीबीआई जांच की मांग कर दी है। उनकी मांग ने अनुशासन समिति की कार्यप्रणाली पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर जब एक विधायक खुलेआम केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच कराने की चुनौती दे रही हैं तो फिर रिपोर्ट को लेकर पर्दा क्यों बना हुआ है। मामला अब केवल तीन विधायकों तक सीमित नहीं रह गया है। दांव पर विधानसभा की साख भी लगी हुई है। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने स्वयं इस मामले को गंभीर मानते हुए जांच के लिए भेजा था। इसलिए अब सबसे ज्यादा निगाहें उन्हीं पर टिकी हुई हैं। यदि इतने दिनों बाद भी अनुशासन समिति की रिपोर्ट सामने नहीं आती और अध्यक्ष स्तर पर कोई पहल दिखाई नहीं देती तो स्वाभाविक रूप से उंगलियां अध्यक्ष की ओर भी उठेंगी। इससे उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और विधानसभा अध्यक्ष पद की गरिमा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। जनता को किसी के खिलाफ कार्रवाई की जल्दी नहीं है, जनता केवल सच जानना चाहती है। आखिर तीनों विधायक निर्दोष हैं या फिर कमीशनखोरी के आरोपों में दोषी। इस एक सवाल का जवाब देने में यदि महीनों लग जाएं तो फिर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। भास्कर का स्टिंग पुराना हो सकता है लेकिन उससे पैदा हुए सवाल आज भी ताजा हैं और जब तक अनुशासन समिति अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करती, तब तक ये सवाल विधानसभा के दरवाजे पर दस्तक देते रहेंगे।
*महेश झालानी, वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर*

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