दो हजार के नोट में नैनो चिप बताने वाले पत्रकार पत्रकारिता पर खड़े कर रहे हैं सवाल

AYUSH ANTIMA
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पत्रकारिता सरकार व जनता के बीच वह सेतु है, जो सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाए व जनता की ग़लत नितियों के साथ कदमताल न करते हुए उसका पुरजोर विरोध करें। इतिहास गवाह है कि राजस्थान में पत्रकारिता के भीष्म पितामह पंडित झाबरमल शर्मा जैसे कलमकार भी हुए हैं, जिन्होंने सरकार से माफी नहीं मांगी अपितु अखबार का संपादन बंद करना ही उचित समझा। रामनाथ गोयनका जैसे कलमकार ने अपने संपादकीय को खाली छोड़कर आपातकाल का विरोध किया था लेकिन अपने पत्रकारिता के सिध्दांतों से समझौता नहीं किया। समय बदला पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट देखने को मिली, पत्रकारिता सियासत की ड्योढ़ी पर हाथ बांधकर खड़ी रही। इलैक्ट्रिक मिडिया ने पैर पसारे, सबसे पहले सबसे तेज की प्रवृति ने पत्रकारिता को रसातल में पहुंचा दिया। विश्व में निष्पक्ष पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिसका मूल उद्देश्य किसी पूर्वाग्रह, दबाव या राजनीतिक प्रभाव से सटीक व सत्य परक जानकारी जनता तक पहुंचाए लेकिन दुर्भाग्य कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अर्थ से दबकर गिरने की अवस्था में है। आरएसएस की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार विश्व प्रेस सूचकांक में भारत 180 देशों की सूची में 157वे नंबर पर है। इस स्थान तक पहुंचाने में देश के कथित इलैक्ट्रिक मिडिया के पत्रकारों का विशेष योगदान रहा है। यह वही पत्रकार हैं, जो 2012 में उधोगपति नवीन जिंदल द्वारा दायर 100 करोड़ रूपये की जबरन वसूली और रिश्वत के मामले में बहुत दिनों तक तिहाड़ जेल की हवा खा चुके हैं। हालांकि उस मामले में बाद में इनको जमानत मिली और 2022 में पुलिस ने कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। उनकी कथित पत्रकारिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण था कि दो हजार रूपये के नोट में नैनो चिप होने का डीएनए किया था, यह पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट की पराकाष्ठा थी। वही पत्रकार आज नार्वे की एक पत्रकारिता पर सवाल खडे कर रहे हैं। विदित हो विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नार्वे प्रथम स्थान पर है। उस नार्वे की पत्रकारिता पर वह पत्रकार सवाल खड़े कर रहा है, जो जेल रिटर्न है व दो हजार के नोट में नैनो चिप जैसी टेक्नोलॉजी का जन्मदाता भी है।

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