भाजपा के शब्द कोष में बहरूपिया शब्द संसदीय

AYUSH ANTIMA
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किसी भी नेता को आंतरिक कलह और चुनावों के दौरान बाहरी बताना एक प्रमुख अस्त्र है। जिस प्रकार भाजपा के राजस्थान प्रभारी राधामोहन अग्रवाल ने सचिन पायलट को बाहरी व बहरूपिया बताया, यह उनके संसदीय भाषा के पतन की पराकाष्ठा ही कहा जायेगा। अग्रवाल ने सचिन पायलट पर व्यक्तिगत प्रहार करते हुए कहा कि बड़ी हैरानी की बात है कि टौंक को एक बहरूपिया नेता मिला। वे टौंक की बात छोड़िए राजस्थान के भी निवासी नहीं है। उनकी एक टांग कांग्रेस में रहती है और दूसरी का पता नहीं कहां रहती है। राधामोहन अग्रवाल ने सचिन पायलट को बहरूपिया व बाहरी बताया तो उनको सोचना होगा कि उनके पिता राजेश पायलट का कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शुमार रहा है। राजेश पायलट को किसान हितैषी नेता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र दौसा बनाया था और वहीं से उनकी पत्नी रमा पायलट भी सांसद रह चुकी है। सचिन पायलट का भी राजस्थान के कद्दावर नेताओं में नाम आता है। सचिन पायलट राजस्थान की राजनीति में सक्रिय रहने के साथ ही राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके हैं, उनके अध्यक्ष के कार्यकाल में 2018 में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी। टौंक की जनता के बीच सचिन पायलट की पैठ मजबूत मानी जाती है। राधामोहन अग्रवाल के बहरूपिया बोलने को लेकर प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने डैमेज कंट्रोल करते हुए बहरूपिये की परिभाषा भी गढ़ी है लेकिन इस बयान को लेकर सचिन पायलट ने अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए बहुत ही सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक टीका टिप्पणी का एक स्तर होता है, व्यक्तिगत कीचड़ उछालने से किसी का भला नहीं हो सकता। लोकतन्त्र की यह मर्यादा है कि विरोधियों को कमतर करके नहीं आंकना चाहिए व उनका सम्मान करना चाहिए। राजनीति सैध्दांतिक, वैचारिक और मुद्दों पर आधारित होनी चाहिए। अब यदि राधामोहन अग्रवाल के इस बयान को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के परिपेक्ष्य में देखे, जिनका गृह राज्य गुजरात है और वाराणसी से तीन बार सांसद जीतकर आ रहे हैं। क्या राधामोहन अग्रवाल में इतनी हिम्मत है कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए इस शब्द का प्रयोग कर सके, ऐसा नहीं है। भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी भी इसी तरह चुनाव लड़ चुके हैं। सुखबीर सिंह जौनपुरिया भी टोंक-सवाईमाधोपुर से भाजपा के लोकसभा सांसद रह चुके है जबकि उनका गृह क्षेत्र गुरुग्राम (हरियाणा) है। भाजपा में बहुत से नेता हैं, जिन्होंने अपने गृह राज्य को छोड़कर दूसरे राज्य को अपना कर्म क्षेत्र समझा। राधामोहन अग्रवाल को इतनी अहंकारी भाषा बोलने से पहले सोचना होगा कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता अंको का खेल है और अंक पलटते आमजन समय नहीं लगाता। सत्ता किसी की बपौती नहीं कि भारत के किसी सभ्य नागरिक को बहरूपिये का खिताब दिया जाए।

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