तरावीह में मुकम्मल हुआ क़ुरआन-इंसानियत के लिए रहमत, हिदायत और कामयाबी का मुकम्मल दस्तूर है क़ुरआन: सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी

AYUSH ANTIMA
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जयपुर: रमज़ान की रहमतों और बरकतों से सराबोर 26वें रोज़े की 27वीं मुबारक रात (शबे क़द्र) में नूरी जामा मस्जिद का नज़ारा ऐसा था, मानो ईमान और रूहानियत का समंदर उमड़ पड़ा हो। तरावीह की नमाज़ के दौरान पूरे रमज़ान में पढ़ा जाने वाला क़ुरआन आज मुकम्मल हुआ। मस्जिद का माहौल अल्लाह की हम्द व शुक्र और जज़्बात से भर उठा। नमाज़ियों की आंखों में खुशी और रूहानियत की चमक साफ दिखाई दे रही थी। इस मुबारक मौके की खुशी में मस्जिद में एक खास तक़रीरी कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की। ऐसा महसूस हो रहा था कि पूरी फिज़ा में क़ुरआन की बरकत और ईमान की रोशनी फैल गई हो। इस मौक़े पर हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन) ने क़ुरआन शरीफ़ की अज़मत, उसकी रहमत और उसकी हिदायतों पर एक दमदार, जोशपूर्ण और दिलों को झकझोर देने वाला बयान पेश किया। अपने प्रभावशाली ख़िताब में उन्होंने कहा कि क़ुरआन पूरी इंसानियत के लिए रहमत और हिदायत का पैग़ाम है। यह वह मुक़द्दस किताब है जो इंसान को गुमराही के अंधेरों से निकालकर हिदायत की रोशनी तक पहुंचाती है और ज़िंदगी को सच्चाई, इंसाफ़, रहमत और अमन के रास्ते पर चलने की तालीम देती है। सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि आज दुनिया में इंसानियत जिन समस्याओं और उलझनों का सामना कर रही है, उनका असली हल क़ुरआन की तालीमात में ही मौजूद है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर मुसलमान फिर से इज़्ज़त, ताक़त और कामयाबी हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें क़ुरआन से अपना रिश्ता मज़बूत करना होगा, क़ुरआन को पढ़ना होगा, समझना होगा और अपनी ज़िंदगी में उतारना होगा। उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि जब मुसलमानों ने क़ुरआन को अपना रहनुमा बनाया, तो वे दुनिया में इज़्ज़त और ताक़त के साथ उभरे। लेकिन जब उन्होंने क़ुरआन से दूरी बनाई, तो वही उम्मत कमज़ोरी और बिखराव का शिकार हो गई। सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी के जोशीले और असरदार बयान ने उपस्थित लोगों के दिलों में नया जोश और नई रूहानी ताक़त पैदा कर दी। मस्जिद का माहौल बार-बार “सुब्हानल्लाह, माशा अल्लाह, अल्हमदो लिल्लाह, अल्लाहु अकबर” की सदाओं से गूंजता रहा। कार्यक्रम के अंत में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी द्वारा मुल्क में अमन-चैन, इंसानियत की भलाई और पूरी उम्मत की तरक्की के लिए खास दुआ की गई। इस तरह 27वीं रात की यह मुबारक महफ़िल इबादत, इल्म और रूहानियत का एक यादगार संगम बन गई, जिसे उपस्थित लोगों ने अपने दिलों में हमेशा के लिए संजो लिया। संदेश साफ था: रमज़ान की बरकतें तभी मुकम्मल होंगी, जब क़ुरआन सिर्फ़ तिलावत तक सीमित न रहे, बल्कि हमारी ज़िंदगी, हमारे समाज और हमारी सोच का हिस्सा बन जाए।

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