साचे का साहिब धणी, समर्थ सिरजनहार। पाखंड की यहु पृथ्वी, प्रपंच का संसार।।
संतशिरोमणि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि सत्यनिष्ठ भक्त की सर्वसमर्थ परमात्मा ही सदैव रक्षा करते हैं। संसार तो पाखंड प्रधान है, अतः सभी प्राणी पाखंड करने वाले की ही प्रशंसा करते है। सच्चे भक्त की नहीं। पाखंडी भक्ति के छलके द्वारा इस संसार में प्रसिद्ध होकर अपनी प्रतिष्ठा जमाते हैं। सच्चे भक्त तो अपने को छिपाते हैं। अतः चाहे कितना ही पाखंड करके प्रसिद्ध क्यों ना हो जाए, परंतु परमात्मा तो उससे प्रसन्न नहीं होता, किंतु जो गुप्त रहकर प्रभु को भजते हैं और वह अपनी कोई प्रतिष्ठा नहीं चाहते, उन पर ही परमात्मा प्रसन्न होते हैं। श्रीमद्भागवत में जिसके हृदय में श्री हरि की भक्ति विराजती है और हरि भी अपने लोक को त्याग कर भक्ति सूत्र से बंधे हुए सर्वदा के लिए उसके हृदय में विराजते हैं। ऐसा भक्त भले ही निर्धन क्यों न हो परंतु धन्यवाद का पात्र है क्योंकि उसके हृदय में श्रीहरि विराजते हैं। अतः परब्रह्म परमात्मा की ही उपासना करनी चाहिए; क्योंकि यह संसार मायिक होने के कारण परिवर्तनशील है और परब्रह्म नित्य एक रस है। ऐसा ऋषि महर्षि कहते हैं ।