राजस्थान के तीन विधायकों को लेकर जो प्रकरण सामने आया है, वह हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं है। संवैधानिक पद की गरिमा होनी चाहिए व राजनीतिक जीवन में सुचिता, ईमानदारी व नैतिकता हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की मूल अवधारणा रही है। देश के उच्चतम पद को सुशोभित करने वाले स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री व स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई ने भारतीय राजनीति में सुचिता के उच्चतम आयाम स्थापित किये थे। भाजपा विधायक रेवंत राम डागा, कांग्रेस विधायक अनीता जाटव व निर्दलीय विधायक ऋतु बनावत की विधायक निधि से पैसा स्वीकृति देने के एवज में कमीशन की खबरें उजागर हुई है। इसको लेकर सभी संवैधानिक पद संदेह के घेरे में है क्योंकि एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है। इन विधायकों ने उन मतदाताओं के विश्वास की हत्या की है, जिनकी वजह से संवैधानिक पद मिला है। अब आमजन के मन में संशय की स्थिति बन गई है कि शायद सभी विधायक इसी परिपाटी का अनुसरण करते होंगे। आमजन की इस भ्रान्ति को दूर करने के लिए विधायकों को चाहिए कि उनके द्वारा स्वीकृत किये गये काम मय राशि सार्वजनिक करें। कहीं ऐसा तो नहीं कि एक सामान्य दरी 25000 में खरीदी जा रही हो। विदित हो विधायक राशि को लेकर हर विधायक को हर वर्ष पांच करोड़ रूपये मिलते हैं, इस राशि को विधायक अपनी मर्जी से जनहित के कामों को लेकर खर्च कर सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात है जनहित न कि निज हित। अब यदि इस मामले में राजनीतिक पहलू देखें तो भाजपा व कांग्रेस जो ईमानदारी की दुहाई देती है आखिर चुप क्यों हैं। क्या जांच समिति का गठन और कारण बताओ नोटिस ही समस्या का समाधान है। वैसे विधायकों की इस बेईमानी में कहीं न कहीं हमारी भी भागीदारी रहती है कि हम थोड़े से लालच व प्रलोभन से गलत व्यक्ति का चयन कर लेते हैं। आखिर इन विधायकों को भी तो हमने ही चुनकर भेजा है। यदि इन विधायकों पर लगे आरोप सही हैं तो यह हमारी लोकतांत्रिक व प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर धब्बा है कि जन-जन के विकास का दावा करने वाले जनप्रतिनिधि खुद के विकास में लीन हैं।
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