इंदौर/जयपुर (श्रीराम इंदौरिया): ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने कहा कि लोकसभा-राज्यसभा में वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर, बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम् के महत्त्व और इतिहास को समझना ठीक है, लेकिन किसी मुसलमान को अपनी धार्मिक आस्था के ख़िलाफ़, इसे पढ़ने या गाने के लिए बाध्य करना, धार्मिक रूप से ग़लत और संविधान की धारा 25 एवं 19 का उल्लंघन है। सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने कहा कि वतन से मोहब्बत हमारी ज़िम्मेदारी है, पर पूजा-संबंधी धार्मिक गीतों को लेकर, हर कोई अपनी आस्था के अनुसार प्रतिक्रिया देगा। हम विरोध नहीं करते, पर अपनी आस्था पर समझौता भी नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि संविधान हर नागरिक को आस्था व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। ज़बरदस्ती वंदे मातरम् गवाना, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा, देश की असली एकता आस्था के सम्मान में है। वतन प्रेम और धर्म दोनों साथ चल सकते हैं, ज़बरदस्ती नहीं।
*कॉल टू एक्शन*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने कहा कि संसद में वंदे मातरम् पर चर्चा स्वागत योग्य, पर संविधान और आस्था की रक्षा के साथ हो। किसी को अपनी आस्था के विपरीत ज़बरदस्ती वंदे मातरम् गाने या पढ़ने को न कहा जाए। उन्होंने कहा कि राजनीति, सरकार और संस्थान वतन से मोहब्बत का संदेश दें लेकिन धार्मिक आज़ादी का सम्मान भी करें।
*सार*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने कहा कि वंदे मातरम् पर, खुली बहस, लोकतंत्र का प्रतीक है, नहीं कि किसी की आस्था पर दबाव या पहचान को चोट पहुंचे। वतन से मोहब्बत और आस्था, दोनों का सम्मान, समान रूप से हो।