राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर स्कूल पहुँचे—अब लोग समझे होंगे कि शायद बच्चों की पढ़ाई देखेंगे, किताबें पूछेंगे, शिक्षक- अनुपात देखेंगे, टॉयलेट की हालत देखेंगे, या कभी-कभार यह भी देख लेंगे कि बच्चों के पास बैठने को कुर्सियाँ हैं या अभी भी फर्श ही लोकतंत्र का सबसे बड़ा सहारा है पर मंत्री जी का फोकस तो बिल्कुल NASA-स्तर का था। सीधे पूछा कि कोई बच्ची बुर्का में तो नहीं आती है। वाह....इस देश के शिक्षा सुधार की जड़ मिल गई, बुर्का। ना लर्निंग आउटकम, ना ड्रोपआउट रेट। सारा दोष तो इसी एक कपड़े का था, जो अब जाकर पकड़ में आया। शायद मंत्री जी के मन में एक अद्भुत सिद्धांत रहा होगा कि अगर बच्ची बुर्का पहनकर आएगी तो गणित के सवाल भी बुर्का पहन लेंगे, विज्ञान के नियम भी पर्दे में चले जाएँगे और इतिहास तो खैर, पहले ही किसी की भी मर्ज़ी से बदल दिया जाता है। स्कूलों में टेबल-चेयर टूटी हों, ब्लैकबोर्ड सफेद हो चुका हो, किताबें पुरानी हों, शिक्षक कम हों—ये सब तो मामूली बातें हैं। जब तक बच्ची की यूनिफॉर्म वैचारिक रूप से स्वीकृत नहीं, तब तक शिक्षा कैसे बचेगी और हाँ, अगर मंत्री जी किसी दिन अस्पताल जाएँ, तो पूछ लें कोई मरीज प्लास्टर में तो नहीं है। कार्यालय जाएँ, तो पूछ लें कोई कर्मचारी चश्मा तो नहीं पहनता क्योंकि अब समस्या का हल यही है..कपड़ों से राष्ट्रीय सुधार की शुरुआत। बच्चियाँ भले किताबों की कमी से जूझें, भले मिट्टी के फर्श पर बैठकर पढ़ें, भले स्कूल की छत बारिश से टपकती हो लेकिन जब तक वे सही पोशाक नहीं पहनेंगी, तब तक शिक्षा मंत्रालय पूरी तरह सुरक्षित महसूस करेगा। दुनिया स्पेस टेक्नोलॉजी और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस में आगे बढ़ रही है और हम। हम वही अनंत यात्रा कर रहे हैं- स्कूलों में गणित और विज्ञान से पहले कपड़ों को पास करवाने की यात्रा। कभी-कभी लगता है, मंत्री जी को शिक्षा से ज़्यादा चिंता दृश्य सौंदर्य की है। कहीं बच्ची बुर्का में दिख गई, तो विकास रुक जाएगा, भारत 5 ट्रिलियन क्या, 5 किलोमीटर भी आगे नहीं बढ़ पाएगा! अंत में-शिक्षा मंत्री जी का यह सवाल देश को एक नया संदेश देता है कि कमरों में रोशनी हो न हो, बच्चों के दिमाग में ज्ञान हो न हो, बस पहनावा वैचारिक रूप से फिट होना चाहिए।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*