अजमेर की राजनीति में इन दिनों एक विवाद तेजी से फैल रहा है। सोशल मीडिया पर यह प्रचारित किया जा रहा है कि धर्मेन्द्र गहलोत देवनानी जी की धर्मपत्नी के देहावसान पर न तो श्मशान घाट पहुँचे और न ही उठावने में शामिल हुए। इसी आधार पर उन्हें एहसान फरामोश और कृतघ्न तक कहा जा रहा है। परंतु जब धर्मेन्द्र गहलोत ने अपनी चुप्पी तोड़ी तो जो तथ्य सामने आए, वे इस विवाद के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। गहलोत कहते हैं कि सबसे पहले तो यह दावा ही मिथ्या है कि देवनानी जी उनके गुरु रहे हैं। उनका राजनीतिक मार्गदर्शन स्वर्गीय वीर कुमार द्वारा हुआ और धार्मिक मार्गदर्शन उन्हें माननीय चंपालाल जी महाराज से मिला। गहलोत ने विद्यार्थी परिषद से लेकर ओबीसी प्रकोष्ठ और युवा मोर्चा तक प्रदेश स्तर पर कई जिम्मेदारियां निभाईं। वर्ष 2000 में वे नगर निगम के उपसभापति बन चुके थे, जबकि देवनानी जी का वास्तविक राजनीतिक पदार्पण अजमेर में 2003 में हुआ। इसलिए गहलोत यह प्रश्न उठाते हैं कि जब वे स्वयं देवनानी जी को शहर के कार्यकर्ताओं, मौहल्लों और संगठन से परिचित करा रहे थे, तब गुरु कौन और शिष्य कौन माना जाना चाहिए।
दूसरा आरोप यह लगाया जाता है कि गहलोत पर देवनानी जी के एहसान हैं। गहलोत इस पर भी स्पष्ट तथ्यों के साथ उत्तर देते हैं। वर्ष 2000 में वे तब उपसभापति बने जब देवनानी जी अजमेर राजनीति में थे ही नहीं। 2005 और 2016 में उन्हें टिकट संगठन ने दिया और पार्षदों तथा जनता ने जिताया। यदि दो अवसरों पर देवनानी जी ने उनका समर्थन किया, तो पाँच चुनावों में गहलोत स्वयं देवनानी जी के साथ खड़े रहे। यदि इसे एहसान की गणना मानें, तो गहलोत के अनुसार उनके खाते में तीन एहसान अधिक हैं। वास्तविकता यह है कि राजनीति में निर्णय सामूहिक संगठन और जन समर्थन से होते हैं, किसी एक व्यक्ति की मेहरबानी से नहीं। सबसे संवेदनशील प्रश्न यह है कि गहलोत शोक संवेदना व्यक्त करने क्यों नहीं गए। इस पर वे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखते हैं। जनवरी 2025 में जब देवनानी जी स्वयं बीमार थे, गहलोत ने कई बार फ़ोन कर कुशलक्षेम पूछने की कोशिश की। बेटे को भी फ़ोन किया, उत्तर नहीं मिला तो व्यक्तिगत नंबर पर संदेश भेजकर उन्होंने शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की। इसके उत्तर में जो प्रतिक्रिया आई, वह कटु थी—एक वॉइस संदेश जिसमें कहा गया कि धर्मेन्द्र गहलोत पुष्पांजलि देने न आए, यह गद्दार है। गहलोत कहते हैं कि जिन्हें उन्होंने पहले ही संवेदना दी, उन संवेदनाओं का उत्तर अपमान में दिया गया। जब स्वयं सामने वाला यह कह चुका हो कि उन्हें उनकी उपस्थिति स्वीकार नहीं, तो क्या संवेदना थोपकर दी जानी चाहिए। उनके मन में परिवार के प्रति दुःख और संवेदना आज भी है, परंतु कर्म से वे इसलिए नहीं गए क्योंकि उन्हें ऐसा करने से रोका गया था। यह विवाद वास्तव में संवेदनाओं का नहीं, बल्कि संवेदना को राजनीति का हथियार बनाने का उदाहरण है। सोशल मीडिया पर आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर चलाया गया अभियान भावनाओं को भड़काने का प्रयास प्रतीत होता है। गहलोत द्वारा प्रस्तुत तथ्य बताते हैं कि उन्होंने पहले भी संवेदनशीलता दिखाई, परन्तु कटुता और व्यक्तिगत आक्रोश ने उन्हें संवेदना व्यक्त करने का अवसर ही नहीं दिया। आखिर में, यह विवाद धर्मेन्द्र गहलोत की संवेदनहीनता का प्रमाण नहीं बनता, बल्कि इस बात का दृष्टांत है कि राजनीति में कभी-कभी संवेदना से अधिक महत्व आरोपों को दिया जाता है। गहलोत का यह कथन पूरे प्रकरण का सार है। आपने संवेदना स्वीकार करने का अवसर ही नहीं दिया, इसलिए मैं संवेदना प्रकट करने नहीं आया।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*