विद्यार्थियों में बढ़ती भावुकता और समाधान

AYUSH ANTIMA
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हाल ही हुई दो छात्रों की आत्महत्याओं ने पूरे देश को झकझोर के रख दिया। अमायरा ने स्कूल की चौथी मंजिल से कूदकर तो देश की राजधानी दिल्ली में शौर्य पाटिल ने ट्रेन के आगे छलांग लगा के आत्महत्या कर ली। शौर्य ने जहां अपने सुसाइड नोट में अपने अध्यापकों के व्यवहार पे सवाल उठाए थे, वहीं अमायरा ने वीडियो में कक्षा के ही अन्य बच्चों द्वारा परेशान करने और ”बैड वर्ड्स" की बात बोलते हुए और एक अन्य ऑडियो में स्कूल जाने से मना करते हुए सुना जा सकता है।
NCRB 2023 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में भारत में कुल 1,71,418 आत्महत्याएँ हुई थीं। उन सभी आत्महत्याओं में छात्रों की हिस्सेदारी लगभग 8.1% है अर्थात् 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की। बढ़ते डिजिटलीकरण, अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और भावनात्मक अस्थिरता ने बच्चों में आवेगपूर्ण निर्णय लेने की प्रवृति को बढ़ाया है। विद्यालयों में पीयर प्रेशर और बुलीइंग के अलावा स्क्रीन टाइम के बढ़ते प्रभावों ने भी इन नाज़ुक बच्चों को मानसिक रूप से थकान ही दी है। वहीं अदृश्य रैगिंग और बॉडी शेमिंग ने बच्चों को उम्र से पूर्व ही शारीरिक मानदंडों की ओर ध्यान खींचने को मजबूर किया है, इस हेतु हाल ही आयी नेटफ्लिक्स पर वेब श्रृंखला ’एडोलसेंस’ एक समीचीन उदाहरण है। इस संदर्भ में वैश्विक संस्था जैसे यूनिसेफ ने भारत में ’लाइफ स्किल फ्रेमवर्क’ में यह माना कि जीवन जीने की कला परीक्षा आधारित शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण है, वहीं यूनेस्को भी जीवन कौशल पर बल दे रहा है। अतः यह आवश्यक है कि बच्चे भावनात्मक रूप से लचीले बने। भारत में देखे तो NCERT ने ’प्रसन्नता आधारित करिकुलम’ स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के साथ प्रत्येक स्कूल में काउंसलिंग को भी प्राथमिकता देता है। भारत में बच्चों की सुरक्षा के लिए कई स्पष्ट नियम लागू हैं, जैसे RTE Act स्कूलों में सुरक्षित व मजबूत भवन, पर्याप्त कक्षाएँ, चाइल्ड फ्रेंडली टॉयलेट, सुरक्षित रेलिंग-खिड़कियाँ और खेल क्षेत्र को अनिवार्य करता है। NCPCR की ’सुरक्षित स्कूल गाइड लाइंस’के तहत भवनों का वार्षिक संरचनात्मक ऑडिट, ऊँची जगहों पर सुरक्षा-ग्रिल, CCTV, प्रशिक्षित स्टाफ और छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित फर्नीचर-फ्लोरिंग की व्यवस्था जरूरी है। BIS मानक इमरजेंसी एक्जिट, फायर फाइटिंग सिस्टम और सुरक्षित सीढ़ियों के नियम तय करते हैं। CBSE ने हर स्कूल के लिए स्कूल सेफ्टी कमेटी मासिक सुरक्षा-निरीक्षण, ऊँची या जोखिम वाले क्षेत्रों पर प्रतिबंधित पहुंच और कक्षा 1–5 को ग्राउंड फ्लोर पर रखने की प्राथमिकता अनिवार्य की है। राज्य सरकारें, विशेषकर राजस्थान, बिल्डिंग सेफ्टी सर्टिफिकेट और नियमित निरीक्षण, असुरक्षित निर्माण पर रोक और परिसर की सुरक्षा-दीवार जैसे नियमों को सख़्ती से लागू कर रही हैं। इसके अलावा POCSO आधारित जागरूकता,विद्यार्थी हेल्पलाइन (1098/ मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाईन 14416) और एंटी-बुलीइंग कमेटी के भी प्रावधान हैं नियम व्यापक हैं। लेकिन चुनौती केवल इनके अनुपालन की है। इन सब प्रावधानों के अलावा व्यक्तिगत रूप से माता पिता को PTM में भाग लेने, उनके साथ समय व्यतीत करने की आवश्यकता है। वहीं अन्य अध्यापकों के साथ कक्षा अध्यापक का यह विशिष्ट और नैतिक कर्तव्य है कि इन बालकों के व्यवहार में आए परिवर्तन को वो मॉनिटर करें, साथ ही उनसे खुलकर बात करें ताकि भारत के उज्जवल और सुखद भविष्य के इन भावी नागरिकों को हम इस तरह न खोए। सभी विद्यालयों में एक कंपलेंट बॉक्स भी हो, जिससे बच्चे अपनी शिकायत दर्ज करवा सके बिना किसी झिझक के और स्कूल प्रशासन उसपे अनिवार्यतः जाँच और कार्रवाई भी करे एवं अमायरा केस में सीबीएसई द्वारा की गई जाँच में पायी गयी खामियों को भी दूर करने का प्रयास करे। अतः आवश्यकता है आज हम सब मिलकर इन्हें एक सुरक्षित बचपन दे सके, इनकी असीमित उड़ान में रंग भर सके।
बच्चों पे शायर ’बशीर बद्र’ने ठीक ही कहा था- ”उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में, फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते”।

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