चिड़ावा सरकारी अस्पताल प्रकरण

AYUSH ANTIMA
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चिड़ावा का सरकारी अस्पताल युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है। विदित हो इस अस्पताल में पीएमओ राजनीति की चपेट में आकर फुटबाल बन गया था। वैसे भारतीय पत्रकारिता के स्तर का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर के चैनल एक जीवित व्यक्ति को सबसे पहले सबसे तेज की प्रवृत्ति के चलते श्रध्दांजली अर्पित कर देते है। जिले में पत्रकारिता की बात करें तो एक बढ़िया मोबाईल व एक माउथ पीस होना ही पत्रकारिता समझ बैठे हैं। किसी भी समाचार को ये यूट्यूबर अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी व्यक्ति की छवि धूमिल करने मे संकोच ही नहीं करते। अस्पताल एक ऐसा संस्थान है, जहां हर तरह के मरीज रहते हैं। यदि यूट्यूबर प्रसूती गृह में घुसकर किसी महिला का इंटरव्यू लेते हैं तो यह मानवीय मूल्यों के तो विपरीत है ही, साथ में अस्पताल प्रशासन की व्यवस्था को लेकर भी प्रश्न चिन्ह लगने लाजिमी है। जिस तरह से यूट्यूबर मारपीट का आरोप लगा रहे हैं, उसमें शायद ही सच्चाई हो क्योंकि जो विडियो वायरल हो रहे हैं, उनको देखकर कहीं भी नहीं लगता कि अस्पताल प्रांगण युद्ध का अखाड़ा हो। जिस तरह से बाहर से जांच करवाने के आरोप अस्पताल प्रशासन पर लगाए जा रहे हैं तो पहले इस बात का संज्ञान ले लेना चाहिए कि सरकारी अस्पताल मे कौन कौनसी जांच मुफ्त होती है। प्रसव की स्थिति में महिला की विभिन्न तरह की जांचे की जाती है, हो सकता है कि जिस जांच को लेकर इतना हंगामा किया गया, उस जांच की व्यवस्था अस्पताल में न हो तो बाहर से ही करवानी पड़ सकती है, जबकि महिला कैमरे के सामने साफ इंकार कर रही है कि उससे अस्पताल प्रशासन ने पैसे नहीं मांगे लेकिन जिस जांच की व्यवस्था अस्पताल में नहीं है, उसको बाहर करवाने के लिए बोला कि दो हजार रूपये लगेंगे।
पत्रकारिता मे कवरेज को लेकर कुछ मापदंड होने के साथ ही भाषा भी संयमित होनी चाहिए। एकतरफा रिपोर्टिंग करने से बाज आना चाहिए व दूसरे पक्ष को भी जनता की अदालत में रखना सटीक व यथार्थ पत्रकारिता की श्रेणी में आता है। यदि अस्पताल प्रशासन के खिलाफ कुछ ठोस सबूत है तो उच्च अधिकारियों को अवगत करवाने की तरफ भी ध्यान जाना चाहिए न कि ऑन द स्पाट वहीं फैसला किया जाए। पत्रकारिता कोई जज नहीं कि हम निर्णय ले सकें। यह वह आईना है, जो सियासत व प्रशासन में बैठे उच्च अधिकारियों व जनता की अदालत में सबूत के साथ रखें जाए। ऐसा नहीं है कि सरकारी अस्पताल में लगे डाक्टर व कर्मचारी दूध के धुले हैं लेकिन इसकी एक प्रकिया होती है, उसकी परिपालना आवश्यक होती है। इस मामले को लेकर अस्पताल प्रशासन का आरोप है कि पत्रकारिता की आड़ में महिलाओं की निजता के उल्लंघन के साथ ही अस्पताल को बदनाम करने की साज़िश है। उन्होंने अपने ज्ञापन में आरोप लगाया है कि पत्रकारिता को लेकर कुछ असामाजिक तत्वों ने अस्पताल प्रांगण में हंगामा किया।

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