राजस्थान के ग्रामीण पत्रकारों की हालत पर बात करना मानो उस सच्चाई को उजागर करना है, जिसे सरकारें सुनना ही नहीं चाहतीं और बड़े मीडिया घराने देखना भी नहीं चाहते। शहरों में एसी दफ़्तरों, चमकदार न्यूज़रूम और आरामदेह संसाधनों वाली पत्रकारिता के बरअक्स गांवों का पत्रकार आज भी अपनी साइकिल, टूटी मोटरसाइकिल, खराब नेटवर्क और आधे-अधूरे साधनों के सहारे लोकतंत्र के सबसे कठिन मोर्चे पर डटा है और विडंबना देखिए, उसी की विश्वसनीयता सबसे ज्यादा है। राजस्थान के ग्रामीण पत्रकार रोज़ जिन चुनौतियों से जूझते हैं, ये चुनौतियां सिर्फ़ ख़बर इकट्ठा करने से नहीं जुड़ी। इनसे पहले अपनी सुरक्षा, अपनी आज़ादी और अपनी रोजी-रोटी बचाने की लड़ाई है। गांवों में खनन माफिया, शराब माफिया, सियासती माफियाओं का इनसे गठबन्धन, इन सबके हितों को चुभती है पत्रकारों की सच्चाई और जब पत्रकार सच लिखता है तो उस पर फोन पर धमकी से लेकर खुलेआम हमले तक, हर जोख़िम मंडराता है। शहर में तो किसी रिपोर्टर के साथ ज़रा-सा भी हादसा हो जाए तो पूरा मीडिया जगत एक सुर में खड़ा हो जाता है, जबकि गांव का पत्रकार अगर पीटा जाए, झूठे केस में फंसाया जाए या सस्पेंड करा दिया जाए तो उसे बचाने कोई नहीं आता। ना संपादक, ना संगठन और ना सरकार। एक तरफ़ शहरों की पत्रकारिता है, जहां प्राइम टाइम की लड़ाई है, टीआरपी की चमक है और “कौन किससे पहले ब्रेकिंग देगा” इसकी भी होड़ है। यहां पत्रकारिता का संकट अलग है। दबाव कॉरपोरेट का है, सत्ता की नजदीकियों का है और है विज्ञापन का, पर इसी भीड़भाड़ के बीच शहर के पत्रकार के पास कम से कम संसाधन, सुरक्षा और प्लेटफ़ॉर्म मौजूद है। ग्रामीण पत्रकार के पास न टीआरपी है, न कॉरपोरेट का सपोर्ट, न कानूनी सुरक्षा और न ही नौकरी की गारंटी। उसका “विज्ञापन” गांव के दुकानदार की एक पर्ची है और उसकी “सैलरी” अक्सर सम्मान, भरोसा या सिर्फ़ वादा होती है। सबसे बड़ा संकट यह है कि ग्रामीण पत्रकारिता को “पार्ट टाइम” समझा जाने लगा है, जबकि यही पत्रकार उन खबरों को सामने लाते हैं, जिनके दम पर शहरों में बैठे बड़े अख़बार अपनी हेड लाइनें सजाते हैं। गांव के रिपोर्टर पर प्रशासन की नाराज़गी का खतरा सीधे पड़ता है। शहर के पत्रकार क़ो तो कक्ष में बैठे आईएएस भी हाथ नहीं लगा सकता पर एक तहसील का पटवारी भी ग्रामीण रिपोर्टर को सबक सिखाने की क्षमता रखता है और जब पूरा सिस्टम ही स्थानीय स्तर पर “मैनेजमेंट” के भरोसे चल रहा हो, तब पत्रकार को खबर नहीं बल्कि अपनी हड्डियां बचानी पड़ती हैं।
राजस्थान सरकार और मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी थी कि वे ग्रामीण पत्रकारों के लिए सुरक्षा, मानदेय और प्रशिक्षण की स्पष्ट व्यवस्था करते पर ज़मीनी हालात यह बताते हैं कि यह वर्ग आज भी पूरी तरह भगवान भरोसे है। सरकारों को गांव में सच्चाई लिखने वाले पत्रकार पसंद नहीं आते और मीडिया मालिकों को गांव से आने वाली खबरें “लो-प्रायोरिटी” लगती हैं, जबकि सबसे खतरनाक सच्चाइयां तो यहीं पनपती हैं।
अब वक्त आ गया है कि ग्रामीण पत्रकारों को “फील्ड का फुट सोल्जर” कहकर भूल जाना बंद हो। उनकी असल ज़रूरतें—सुरक्षा, वित्तीय स्थिरता, कानूनी संरक्षण और उनकी पहचान का सम्मान, राजस्थान के लोकतंत्र की अनिवार्य शर्तें हैं। शहर की चमक वाली पत्रकारिता लोकतंत्र की शोभा हो सकती है पर गांव का पत्रकार लोकतंत्र की रीढ़ है और अगर यह रीढ़ कमजोर पड़ गई तो फिर न लोकतंत्र बचेगा, न उसकी साख, न उसकी आवाज़।
ग्रामीण पत्रकार सिर्फ खबर नहीं लिखते, वे राजस्थान की आत्मा की आवाज़ लिखते हैं और अब यह आवाज़ दबाई नहीं जानी चाहिए बल्कि सुनी, समझी और सुरक्षित की जानी चाहिए।
*सुरेन्द्र चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार ✍️*