चिड़ावा सरकारी अस्पताल प्रकरण भाग -

AYUSH ANTIMA
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झुन्झुनू जिले में चिड़ावा सरकारी अस्पताल ऐसा नहीं कि इन दिनों ही चर्चा में है। यह अस्पताल पीएमओ के पद को लेकर भी काफी चर्चा में रहा था। स्थानीय राजनीति के चलते पीएमओ के पद को फुटबॉल बना दिया था। भाजपा के दो स्थानीय नेताओं की गुटबंदी शायद आजकल जो प्रकरण में भी कहीं न कहीं उसी गुटबाजी की बू आ रही है। नेताओं के वर्चस्व की इस लड़ाई ने रोजाना ऐसे एपीसोड देखने को मिल रहे हैं कि आखिर पत्रकारिता किधर जा रही है। क्या पत्रकारिता के मापदंड केवल और केवल एक बढ़िया मोबाईल व एक माउथ पीस हो गया है। क्या यूट्यूबर अधिकृत पत्रकारों की श्रेणी में आते हैं। बिना आरएनआई नंबरों के बिना कोई भी मिडियाकर्मी बताने वाला पत्रकार किसी सरकारी संस्थान की विडियोग्राफी कर सकता है ? यदि नहीं तो झुन्झुनू का जनसम्पर्क विभाग आखिर इन यूट्यूबर को लेकर गंभीर क्यों नहीं है। इस प्रकरण में सरकारी अस्पताल के डाक्टरों के व्यवहार को उचित ठहराने की कवायद नहीं है लेकिन जिस तरह से इस प्रकरण पर से रोज पर्दा उठ रहा है तो बहस करनी लाजिमी हो जाती है। पत्रकारों की तरफ से आरोप लगाए जा रहे हैं कि उनको डाक्टरों द्वारा दुर्व्यवहार करने के साथ ही मारपीट की गई। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो अस्पताल परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, उनकी फुटेज से दूध का दूध व पानी का पानी हो जायेगा। वैसे भी पत्रकार के साथ कैमरामैन होता है, उसने वह मारपीट की वारदात कैमरे में कैद क्यों नहीं की ? 
चिड़ावा अस्पताल के प्रकरण पर यदि स्थानीय राजनीति पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है क्योंकि इस प्रकरण में कहीं न कहीं स्थानीय राजनीति का भी योगदान है। विदित हो पीएमओ पद को लेकर भाजपा के दो स्थानीय नेताओं ने इसको अपने वर्चस्व की लड़ाई समझ लिया था। राजनिति में फंसकर पीएमओ का पद फुटबाल बन कर रह गया। कहते हैं कि जो जीता वही सिकंदर पीएमओ की इस उठा पटक मे भाजपा के दूसरे गुट ने डाक्टर जांगीड़ को लेकर पीएमओ की ताजपोशी कर दी। सूत्रों की मानें और आम चर्चा को देखें तो डाक्टर जांगीड़ का अनुशासन व अस्पताल में सुधार डाक्टरों के दूसरे गुट को रास नहीं आया क्योंकि भाजपा की गुटबाजी डाक्टरों की गुटबाजी में तब्दील हो गई। लगता है यूट्यूबरो की आड़ में स्थानीय नेता अपनी नेतागिरी चमकाने की फिराक में है। विकास की बात करने वाले स्थानीय नेताओं की जबान पर ताला लगा हुआ है जबकि आमजन इस लड़ाई में पीस रहा है। स्थानीय नेताओं को इस बात का संज्ञान लेना चाहिए कि जैसा आरोप लगाया जा रहा है कि सोनोग्राफी मशीन होने के बावजूद बाहर सोनोग्राफी के लिए क्यों भेजा जाता है।

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