राजस्थान एसआई भर्ती: सपनों की कब्रगाह, अदालत की जिरह और सरकार की खामोशी

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान की बहुचर्चित सब-इंस्पेक्टर भर्ती अब केवल एक परीक्षा या चयन प्रक्रिया का मसला नहीं रह गई, बल्कि यह न्यायपालिका, कार्यपालिका और युवाओं के भविष्य की असली परीक्षा बन चुकी है। कभी हजारों युवाओं के सपनों का दरवाजा मानी गई यह भर्ती अब अदालतों की फाइलों में उलझी है और भ्रष्टाचार के काले खेल का आईना बन चुकी है। हाईकोर्ट के जस्टिस समीर जैन ने पेपर लीक और धांधलियों को देखते हुए भर्ती को रद्द कर दिया। न्यायाधीश ने तीखे शब्दों में कहा था कि “धोखा व्यवस्था की आत्मा को भी भ्रष्ट कर देता है” लेकिन खंडपीठ ने इस फैसले पर रोक लगाकर नई पेचीदगी खड़ी कर दी। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। यहां तय हो सकता है कि भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं का रास्ता कौन-सा होगा। सबसे बड़ी त्रासदी उन युवाओं की है, जिन्होंने बिना किसी जोड़ तोड़, पूरी ईमानदारी से चयन पाया। अनेक चयनित “मैंने पांच साल सिर्फ इस भर्ती को पाने में लगा दिए। अब अगर परीक्षा दोबारा हुई और मेरा नाम बाहर रह गया तो मेरी मेहनत का हिसाब कौन देगा ?” दूसरा उम्मीदवार कहता है—“यह हमारे जीवन के साथ क्रूर मजाक है। अगर हम ईमानदारी से भी पास नहीं माने जाएंगे तो फिर इस व्यवस्था पर भरोसा कैसे करें ?”
लेकिन अगर भर्ती निरस्त नहीं होती तो वही उम्मीदवार वर्दी पहनेंगे, जिन्होंने पैसे और नकल के दम पर रास्ता बनाया। ऐसे अफसर जब जनता के ऊपर कानून का शिकंजा कसेंगे तो क्या यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं होगा ? न्यायालय को इस तथ्य की भी अनदेखी नही करनी चाहिए क्योकि एसआई का पद बहुत ही संवेदनशील है। एक गलत व्यक्ति पूरे समाज मे जहर घोलने में सक्षम होता है। इस पूरे प्रकरण में सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। भर्ती प्रक्रिया में धांधलियां उजागर होने के बावजूद सरकार ने न तो कोई ठोस कदम उठाया, न ही युवाओं की आवाज़ सुनी। नतीजा यह हुआ कि पूरा मामला अदालतों पर छोड़ दिया गया। सरकार की खामोशी और निष्क्रियता ने अभ्यर्थियों की पीड़ा और बढ़ा दी है। सवाल उठता है कि क्या यह वही सरकार है, जो युवाओं को रोजगार देने के बड़े-बड़े वादे करती रही है? क्या सरकार अदालत की आड़ में अपनी जिम्मेदारी से बच सकती है ?
अब अदालत के सामने यह दोराहा है कि अगर भर्ती रद्द होती है तो ईमानदार चयनित युवाओं के साथ नाइंसाफी होगी और अगर रद्द नहीं होती तो भ्रष्ट लोग पुलिस अफसर बनकर जनता की छाती पर मूंग दलेंगे। इस टकराव का हल शायद केवल एक रास्ते में है कि ईमानदारी से चयनित अभ्यर्थियों को यथोचित आर्थिक मुआवजा देकर उनकी मेहनत का सम्मान किया जाए।
इतना तय है कि सुप्रीम कोर्ट या अधीनस्थ न्यायालय का इस संबंध में दिया गया फैसला न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश की भर्ती प्रणाली के लिए नजीर बनेगा। यह फैसला तय करेगा कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा या फिर युवाओं की आहें भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता को हमेशा के लिए दफन कर देंगी।

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