मुफ्त की रेवड़ियों की बंदरबांट

AYUSH ANTIMA
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केन्द्र व किसी भी राज्य में चुनावो की घोषणा होते ही राजनीतिक दल मुफ्त के वादों की झड़ी लगा देते हैं, जैसे कोई कंपनी अपने माल को बेचने के लिए मुफ्त की सैल लगाती है। यह मुफ्त की बंदरबांट का सिलसिला दक्षिण भारत से शुरु हुआ था, जिसने अब पूरे भारत में अपने पैर पसार लिए हैं। सबसे सोचनीय विषय यह भी है कि राजनीतिक दल एक दूसरे पर मुफ्त की बंदरबांट को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगाते हैं लेकिन खुद इस मुफ्त की दुकान सजा लेते हैं। राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, महाराष्ट्र, तेलंगाना व दिल्ली के जो वादे किए गये थे, उनमें से कितने पूरे हुए यह सर्व विदित है। इसी तरह केन्द्र सरकार की किसान सम्मान योजना, मुफ्त रसोई गैस, मुफ्त शौचालय व मुफ्त अनाज भी रेवडियो की बंदरबांट की श्रेणी में ही आते हैं। इन योजनाओं को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। इस तरह की बंदरबांट को लेकर देश के अर्थशास्त्रीयो ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि आने वाले समय में सभी के लिए रोजगार जुटाना संभव नहीं होगा। ऐसे में सरकारों को न सिर्फ गरीब तबके को मदद करनी होगी बल्कि उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाए बिना मदद व सम्मान जनक रोजगार उपलब्ध करवाने होंगे। अभी तक केन्द्र व राज्य सरकारों के चुनावों में राजनीतिक दल आत्म सम्मान को नजर अंदाज कर मुफ्त बांटने का पिटारा खोल रहे हैं। मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की सोच से उपर उठकर काम के बदले अनाज व मनरेगा जैसी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू कर सम्मान के साथ जीने का अधिकार देना होगा। राजनीतिक दलों को वोट बैंक की राजनीति से उपर उठकर जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू करना होगा। दो बच्चों के कानून को कड़ाई से पालन करवाने को लेकर उन सभी को सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने के साथ ही मताधिकार से भी वंचित करना होगा। देश में यदि मुफ्त करना है तो मूलभूत सुविधाएं जैसे शिक्षा व स्वास्थ्य सभी के लिए हो ऐसी व्यवस्था करनी होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के महत्वाकांक्षी योजना मैक इन इंडिया को प्रभावी तरीके से लागू कर व्यवसायिक शिक्षा पर जोर देना होगा, जिससे व्यक्ति काम सीखकर अपना जीवनयापन कर सके। लघु व कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की जरूरत है, इसमें रोजगार की प्रबल संभावनाए है। देखा जाए तो यह मुफ्त बांटने की संस्कृति आम आदमी पर ही बोझ बनकर रह गई है। सरकारों के इन योजनाओं को लेकर अतिरिक्त संसाधन जुटाने पर ध्यान न देकर घाटे में जाने के साथ ही महंगाई को भी बढावा मिलता है। अतः मुफ्त की रेवड़ियों की बंदरबांट को बंद करने को लेकर देश के हर राजनीतिक दल को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

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