धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
By -
0



मन रे, अंतकाल दिन आया, तातैं यहु सब भया पराया॥टेक॥ श्रवनों सुनै न नैनहुँ सूझै, रसना कह्या न जाई। शीश चरण कर कंपन लागे, सो दिन पहुँच्या आई॥१॥ काले धोले वरण पलटिया, तन मन का बल भागा। जौबन गया जरा चल आई, तब पछतावन लागा॥२॥ आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना। पाँचों थाके कह्या न मानैं, ताका मर्म न जाना॥३॥ हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझि देख मन मांहीं। दिन दिन काल ग्रासै जियरा, दादू चेतै नाँहीं॥४॥ रे मन ! अब तेरा अन्तकाल आ गया है। अब तेरा धन भी पराया हो गया। कानों से सुनता नहीं, नेत्रों से दीखता नहीं। वाणी का बोल बन्द हो गया। हाथ, शिर, पैर कांपने लगे हैं। काले बाल सफेद हो गये। शरीर कुरूप और निर्बल हो गया। मन में भी विकलता छा गई। यौवन लुट गया। वृद्धावस्था आ गई। अब तू पश्चाताप करता है कि हाय, मैंने कल्याण के लिये कोई साधन नहीं किया, मेरी आयु ऐसे ही क्षीण हो गई। शरीर भी जीर्ण-शीर्ण हो गया। पाचों इन्द्रियों का ज्ञान भी प्रायः लुप्त हो गया, यह हंसात्मा भी जाने की जल्दी कर रहा है। प्राण भी प्रायः निष्प्राण से होते जा रहे हैं। हे मन ! अब भी सावधान होकर देख, यह काल तेरी आयु को प्रतिक्षण नष्ट कर रहा है और तू फिर भी नहीं चेतता। योगवासिष्ठ में लिखा है कि –जवानी, बचपन, शरीर और द्रव्य-संग्रह ये सबके सब अनित्य हैं और जल तरंगों की तरह एक भाव से दूसरे भाव को प्राप्त होते रहते हैं। इस संसार में प्राणियों का जीवन हवा से भरे हुए स्थान में रखी हुई दीपक की लौ के समान चंचल है अर्थात् शीघ्र ही जाने वाली है। तीनों लोकों के संपूर्ण पदार्थों की शोभा(चमक-दमक) बिजली के चमक के समान क्षणिक है। हे महर्षे ! ये उत्सव और वैभव से सुशोभित होने वाले दिन, ये महा प्रतापी पुरुष, वे प्रचुर सम्पत्तियां तथा बड़े बड़े कर्म सबके सब दृष्टि-पथ से दूर होकर केवल स्मरण के विषय रह गये। इसी तरह हम भी क्षणभर में अज्ञात स्थान को चले जायेंगे। यह संसार प्रतिदिन नष्ट और पैदा होता है। अतः आज तक इस नष्टप्रायः जले हुए इस संसार का अन्त नहीं हुआ। अतः सावधान होकर हरि भजन करना चाहिये।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!