कांग्रेस की झुंझुनूं के प्रति संवेदनशीलता या पुरानी परिपाटी का अनुसरण

AYUSH ANTIMA
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झुंझुनूं के सांसद महोदय ने लोकसभा में नियम 377 के अंतर्गत मांग उठाई कि पूर्व में संचालित डाबला से खेतड़ी, सिंघाना व हिन्दुस्तान कापर लिमिटेड के मध्य जो मीटर गैज रेलवे लाईन संचालित थी, वह अब बंद हो चुकी है। सांसद महोदय ने इसको लेकर पूरजोर मांग की है कि डाबला, खेतडी, सिंघाना व चिड़ावा तक करीब 74 किमी रेल लाईन बिछाई जाए, जिससे शेखावाटी के लोगों के लिए व्यापार और आवागमन सस्ता व सुलभ हो सके। निश्चित रूप से सांसद महोदय की झुन्झुनू के हितों को लेकर की गई मांग का स्वागत होना चाहिए लेकिन इस बात का भी पोस्टमार्टम करना जरुरी हो जाता है कि भारत की ही नहीं बल्कि एशिया की प्रसिद्ध हिन्दुस्तान कापर लिमिटेड व खेतड़ी कापर प्रोजेक्ट की दुर्दशा के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है ? राजनीतिक इच्छा शक्ति का पतन कहे या नेताओं का निजी स्वार्थ कि झुन्झुनू जिले के हजारों स्थानीय लोगों को रोजगार देने वाले इस संस्थान की दुर्दशा देखने को मिल रही है। खेतड़ी कापर काम्प्लेक्स की हालत 1990 के दशक के मध्य बदहाल होना शुरू हो गई थी। विदित हो केसीसी ने 1970 के दशक में देश को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। समय के साथ केसीसी की मशीनरी पुरानी हो गई, जिससे उत्पादन क्षमता कम होने से लागत बढ़ गई। केसीसी राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते कुप्रबंधन का भी शिकार हो गई थी। विदित हो केसीसी हिन्दुस्तान कापर लिमिटेड के स्वामित्व में है व सरकार व स्थानीय नेताओं की उदासीनता के चलते 2000 के दशक में केसीसी बंद होने के कगार पर पहुंच गई व सरकार ने इसे बचाने के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किए। अब सांसद महोदय भारत की सबसे पुराने राजनीतिक दल से है व इसको लेकर कांग्रेस के ही कद्दावर नेता के इतिहास को भी देखना होगा कि केन्द्र में लगातार मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने इसको लेकर क्या किया, जो आज भाजपा सरकार से सांसद महोदय मांग कर रहे हैं। शेखावाटी के कद्दावर नेता व स्वर्गीय शीशराम ओला, जिनके इर्द-गिर्द झुंझुनूं की राजनीति घूमती थी, 1996 से 1997 तक केन्द्र में रसायन व उर्वरक मंत्रालय के स्वतन्त्र प्रभार के मंत्री थे। 1997 से 1998 तक वे जल संसाधन मंत्रालय में स्वतन्त्र प्रभार के केन्द्रीय मंत्री रहे, तत्पश्चात श्रम मंत्रालय के प्रभारी रहने के साथ ही खान मंत्री रहे। जब सरकार में मंत्री रहने के बावजूद केसीसी की दुर्दशा व रेल नहीं ला सके तो आज सांसद महोदय इसकी मांग को उठाकर उसी परिपाटी का अनुसरण कर रहे है, जो कांग्रेस साठ सालों से यमुना नहर की मृग मरीचिका दिखाती आई है। खान मंत्री रहते स्वर्गीय शीशराम ओला ने इस संस्थान में जान फूंकने के लिए क्या कदम उठाए, यह झुंझुनूं के आवाम का एक ज्वलंत प्रश्न है। सांसद महोदय की इस मांग से स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि सांसद महोदय भी उसी परिपाटी का अनुसरण कर रहे हैं, जिसका कांग्रेस करती आई है।

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