आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग। दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग।। संत शिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि यह तेरा यह मेरा इस भाव को त्याग दो। यह तेरा यह मेरा ऐसे विचार तो हल्के विचार वालों के होते हैं। जो महान चित्त वाले हैं। उनके लिए तो सारा संसार ही कुटुंब है। अतः सत्पुरुषों की संगति से तेरे-मेरे भाव को दूर करो। भगवान की भक्ति करो। काल किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता, प्रतिदिन जा रहा है। युवावस्था भी अति चंचल है, जो जो भोग पदार्थ हैं, वे सब दुरन्त दुःख देने वाले हैं। भाई बंधु सब बांधने वाले हैं। भोगों को तो तुम महारोग ही समझो। तृष्णा मृगतृष्णा की तरह मिथ्या है, अपनी इंद्रियां ही शत्रु है। अपना शत्रु आप ही है, आप अपने आप को मार रहा है। चींटी से लेकर ब्रह्मपर्यंत सभी भूत जातियां तुच्छ ही है। यह देह भी केवल दुःख के लिये ही है। सर्वथा अनात्मा होते हुए भी अपने को आत्मा मानने का चमत्कार दिखला रहा है, क्षण में ही आनंदित हो जाता है और क्षण में दुःखी हो जाता है। देह के समान नीच शोचनीय तथा गुणहीन कोई भी पदार्थ नहीं है। ऐसा ज्ञान प्राप्त करके अपने आप को जगाओ। ब्रह्मसूत्र में संगति करो तो सत्पुरुषों की करो, भगवान की दृढ़ भक्ति करो। ईश्वर का पूजन करो। काम, क्रोध, लोभ, मोह की बुद्धि को त्याग दो। प्रतिदिन विद्वानों का संग करो और उनके सदकर्मों का आचरण करो।
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