कहो क्यों जन जीवै सांइयां, दे चरण कमल आधार हो। डूबत है भव सागरा, कारी करौ करतार हो॥ मीन मरै बिन पाणियां, तुम बिन येह बिचार हो। जल बिन कैसैं जीवहीं, अब तो किती इक बार हो॥ ज्यौं परै पतंगा ज्योति में, देख देख निज सार हो
प्यासा बूंदन पावई, तब बन बन करै पुकार हो॥ निस दिन पीर पुकार ही, तन की ताप निवार हो। दादू विपति सुनावही, कर लोचन सन्मुख चार हो॥ हे भगवन् ! आप ही विचारिये कि आपका दास आपके बिना कैसे जी सकता है। अत: आप अपने चरण कमलों का आश्रय मुझे दीजिये। हे नाथ ! मैं संसार समुद्र में पड़ा हूँ। आप भक्तों का उद्धार करने वाले, सृष्टि को बनाने वाले हैं। मेरा संसार सागर से उद्धार कीजिये। जैसे मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती किन्तु तत्काल मर जाती है, वैसे ही मैं भी आपके दर्शनों के बिना जी नहीं सकता हूँ। आप ही विचार कर देखिये कि आपका दास आपके विरह में कब तक जीता रहेगा ? उसके प्राणपिण्ड का तो तत्काल वियोग हो जायगा। जैसे पतङ्ग अग्नि में जलकर मर जाता है। वैसे ही विश्व में सुन्दर से सुन्दर आपका जो सौन्दर्य है, उस पर मुग्ध होकर अपना बलिदान दे रहा हूँ। प्यासा चातक जैसे वन-वन में घूमता हुआ पानी की याचना करता है, वैसे ही मैं आपके दर्शनों का प्यासा दिन रात विरह व्यथा से व्यथित आर्त स्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ कि मेरे को आप दर्शन देवें, जिससे मेरी विरह व्यथा दूर हो जाय। यद्यपि आप तो सर्वव्यापक है और पो को देख भी रहे है, किन्तु मैं आपको देख संकू ऐसी कृपा कीजिय। क्योंकि, आपके दर्शन करके दर्शनानन्द से आपके स्वरूप में मिल जाऊंगा, जिसे फिर विजया दुखी न होकं। यह ही दर्शन मांगने का भाव है।
भक्तिरसायन लिखा है कि- विरह होने पर ही विरहजन्य ताप होता है और द्वैतभाव बिना विरह नहीं हो सकता। अत: गोपियां ताप की निवृत्ति के लिये कृष्णमय बन गई। भगवान सर्वात्मा होते हुए भी सवय भिन्न है, मूर्तिमान होते हुए भी दिखते नहीं, क्रीडान करते हुए भी अदभुत क्रीडा वाले हैं। वह भगवान हमारी रक्षा करें।