मनोज स्वामी को एक लाख रुपए का राजस्थानी साहित्य भूषण सम्मान प्रदान किया गया

AYUSH ANTIMA
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श्रीडूंगरगढ़/बीकानेर (तोलाराम मारू): राजस्थानी रामलीला के लेखक एवं राजस्थानी भाषा मान्यता के प्रखर आंदोलनकारी मनोज स्वामी का श्रीडूंगरगढ़ की संस्था गुणीजन सम्मान समारोह समिति द्वारा एक लाख रुपये की राशि, शॉल, श्रीफल तथा प्रशस्ति-पत्र समर्पित कर राजस्थानी साहित्य भूषण सम्मान प्रदान किया गया। इस समारोह में विद्वानों द्वारा ''कियां मिल सकै राजस्थानी नै मान्यता" विषय पर राजस्थानी भाषा में अपने उद्‌गार व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्याम महर्षि ने कहा कि भाषा के मसले में राजस्थान अपने निर्माण काल के मुख्यमंत्री की भूल की सजा भुगत रहा है। आजादी के पिचहतर वर्ष के पश्चात भी राजस्थान अपनी भाषा की मान्यता मांग रहा है और राजनेताओं को इससे कोई सरोकार नहीं है। राजस्थान के नेताओं की इच्छा शक्ति चुकी हुई है। मुख्यमंत्री चाहे तो कुछ ही दिनों में राजस्थानी को राजस्थान की राजभाषा बना सकते हैं। महर्षिजी ने कहा कि राजस्थानी लोगों को अपनी भाषा की फिक्र करनी चाहिए। गुणीजन सम्मान समारोह समिति के अध्यक्ष लॉयन महावीर माली ने कहा कि भाषा एक दर्पण है, जिसमें हमारी संस्कृति का चेहरा दिखता है। भाषा मरते ही संस्कृति और परंपराएं स्वतः ही मर जाएंगी। नेताओं को बाध्य किया जाए कि वे अपनी घोषणाएं एवं सम्भाषण राजस्थानी में करे। सम्मानित साहित्यकार मनोज स्वामी ने विस्तार से राजस्थानी आंदोलन की रूपरेखा बताई और उपस्थित जनों से निवेदन किया कि आगामी जनगणना में मातृभाषा राजस्थानी दर्ज करवाना भूलें नहीं। उन्होंने कहा कि वे जमीनी स्तर पर भाषा के आंदोलनकारी तैयार कर रहे हैं। वर्तमान में राजस्थान के प्रत्येक नागरिक की सबसे बड़ी लड़ाई, भाषा की है। साहित्यकार डॉ.मदन सैनी ने कहा कि सरकार ऐसे दिखा रही है कि उसे भाषा के आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़‌ता। भाषा के प्रति किए जानेवाले षड्यंत्रों को समझना होगा। कथाकार सत्यदीप ने कहा हमें राजनेताओं को बाध्य करना पड़ेगा कि वे राजस्थानी भाषा में बात करे। युवा साहित्यकार गौरी शंकर निमिवाल ने कहा कि गांव कस्बों में भाषा आंदोलन के लिए युवाओं को तैयार करना होगा। राजस्थानी भाषा आंदोलन से जुड़े मुरलीधर उपाध्याय ने कहा कि राजस्थानी की मान्यता तथा राजभाषा लागू करने के लिए हर घर परिवार को लगना होगा। कार्यक्रम संयोजक डाॅ.चेतन स्वामी ने कहा कि भौतिक प्रतंत्रता से भाषा की प्रतंत्रता अधिक कठिन है। जिस क्षेत्र की भाषा समृद्ध है, वहां की संस्कृति समृद्ध है। भाषा के आंदोलन में पारस्परिकता से काम करना होगा। कार्यक्रम में नगर के अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे। गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति, श्रीडूंगरगढ की ओर से भी मनोज स्वामी का सम्मान किया गया।

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