एक पेड़ मां के नाम अभियान कितना सार्थक

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान प्रदेश की बात करें तो जंगलो की अंधाधुंध अवैध रूप से कटाई व रिहायशी इमारतों के निर्माण से पेड़ों की संख्या में अभूतपूर्व गिरावट देखने को मिली है। पेड़ पौधो की संख्या में गिरावट से पर्यावरण संरक्षण अभियान में ब्रेक लगने स्वाभाविक है। केन्द्र सरकार के आह्वान पर राजस्थान सरकार एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत वृक्षारोपण कर रही है, जिसमें स्वयंसेवक व सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी देखी गई है। हर साल बरसात के मौसम में वृक्षारोपण अभियान अपने यौवन पर रहता है। सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं व सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस अभियान पर करोड़ों रूपये खर्च होते हैं। सरकारी आयोजन को लेकर बात करें तो मुख्यमंत्री इस अभियान में शामिल होने के लिए हेलीकॉप्टर का प्रयोग करते हैं और एक पेड़ के हाथ लगाकर व उसमें पानी डालकर इस अभियान की रस्म अदायगी की जाती है। मुख्यमंत्री के आगमन में स्थानीय प्रशासन हरकत में आ जाता है और इस भागदौड़ में भी धन व्यय होता है। इसके अलावा मंत्रीमंडल में मंत्री की शोभा बढ़ाने वाले मंत्री, विधायक और संगठन के नेता भी इस अभियान में कूद पड़ते हैं और फोटो सैशन करके अभियान को पूरा करने में अपना पूरा योगदान देते नजर आते हैं। अब सवाल उठता है कि हर साल सरकार के करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाकर करोड़ों पेड़ लगाने का दावा किया जाता है तो आखिर यह करोड़ों पेड़ आमजन की आंखों से ओझल क्यों हो जाते हैं ? पर्यावरण को लेकर गंभीर सरकार व संगठनों को सोचना होगा कि एक पेड़ के हाथ लगाकर फोटो सैशन करवाना ही क्या इस अभियान की सार्थकता है। स्थानीय नगर निकाय, पंचायत व नगर परिषद इस अभियान को लेकर लाखों करोड़ों रूपये का टैंडर निकाल कर खुद के पारिवारिक पर्यावरण को सुरक्षित करते हैं। एक पेड़ मां के नाम अभियान निश्चित रूप से मां के प्रति श्रध्दा व समर्पण का भाव व्यक्त करने वाला अभियान है लेकिन एक मां जिस तरह उसकी कोख से पैदा होने वाले बच्चे की देखभाल कर उसे बचपन से यौवन की देहरी तक पहुंचाने में अपना पूरा जीवन खपा देती है तो क्या वृक्षारोपण द्वारा किये गये पेड़ों की देखभाल उसी परिपाटी से होती है। पेड़ को जमीन मे रोपना ही इस अभियान का उद्देश्य नजर आता है। उस पेड़ को आवारा पशुओं से बचाना व समय समय पर उसमें पानी देना भी इस अभियान का हिस्सा होना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि करोड़ों वृक्षारोपण का दावा करने वाली सरकारी मशीनरी आगामी बरसात के मौसम तक सैकडो की संख्या में ही उनको देख पाती है और यह अभियान कागजों, अखबार की कतरनों और फोटो सेशन तक ही सिमित होकर रह जाता है। एक पेड़ की देखभाल ऐसी होनी चाहिए, जैसे एक मां अपने बच्चे को सर्दी व गर्मी से बचाकर उसको जवानी के पड़ाव पर ले जाती है। यदि एक मां अपने बच्चे के जन्म देने के बाद उससे मुंह फेर लेती है तो क्या वह बच्चा जिंदा रह सकता है ? यदि नहीं तो एक पौधारोपण करके पर्यावरण को सुरक्षित रखने के इस स्वांग का क्या औचित्य रह जाता है। एक तरफ नेताओं व सरकारी अधिकारियों के संरक्षण में अवैध रूप से पेड़ों के काटने की खबरें देखने को मिल रही है और दूसरी तरफ सरकार कागजों में वृक्षारोपण कर पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में काम कर रही है। यह दोनो ही परिस्थितियां विरोधाभासी होने के कारण सरकार के मंसूबों पर प्रश्न चिन्ह लगाने का काम कर रही है ।

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