गौवंश केवल राजनीतिक व स्वार्थ सिद्धि का मोहरा

AYUSH ANTIMA
By -
0


गौवंश को बचाने को लेकर बहुत बड़े दावे देखने को मिलते है लेकिन यह सब बातें हवा हवाई बनकर रह जाती है। जिले की एक गौशाला को लेकर सोशल मिडिया पर आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है, जो कि उसी परिपाटी का अनुसरण है, जो मैंने लेख में उपरोक्त लिखा है। शेखावाटी की धरा शूरवीरों व भामाशाहों के लिए विख्यात रही है। गौवंश व गौभक्त उदारमना से गौशालाओं में आर्थिक सहयोग देते रहे हैं और वह अनवरत जारी है। गौशाला का संचालन वहां की स्थानीय लोगों की कमेटी करती है, जिसका गठन गौशाला के आजीवन सदस्य या गौशाला प्रबंधन कमेटी के द्वारा लिखित संविधान के अनुसार होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिले की बहुत गौशाला प्रबंधन कमेटी पर एक ही परिवार का एकाधिकार है, जहां चुनावों की गुंजाइश बहुत ही कम है। यही कारण है कि उन गौशालाओं में गौशाला का संचालन न होकर डेयरी का संचालन हो रहा है। गौवंश जो सड़को पर कूड़ा कचरा खाता बेसहारा घूम रहा है, उनको यह गौवंश दिखाई नहीं देता है। जो सोशल मिडिया पर वाक युद्ध देखने को मिल रहा है, उनकी भी गौवंश के प्रति उतनी ही श्रध्दा है, जो उन गौशाला प्रबंधकों की है। गौ रक्षकों की लंबी कतार भी देखने को मिली है लेकिन कहीं भी यह नजर नहीं आ रहा कि गौवंश के लिए संवेदनशील है। यदि सचमुच उनके मन में गौवंश के प्रति आदर और प्रेम का सागर हिलौरें मार रहा है तो उनको गौशाला प्रबंधन कमेटी के खाता बही देखने में इतना लगाव क्यों है और खाता बही सोशल मिडिया पर नहीं देखे जा सकते, उनको देखने का भी एक मंच होता है, वहां पर देखे जा सकते हैं। बेसहारा गौवंश को गौशाला तक भेजने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन व स्थानीय लोगों की है, इसको लेकर उन महानुभावो को राजनीतिक दबाव बनाकर ऐसा प्रबंध करें कि बेसहारा गौवंश को आसियाना मिल सके। यदि स्थानीय गौशालाओं में गौवंश को रखने की क्षमता पूरी हो चुकी है तो अन्य किसी जगह गौशाला खोली जा सकती है, उसको लेकर प्रयास होने चाहिए। सामाजिक संगठनो के प्रबंधन करने वालों पर आक्षेप लगाने वालों की कमी नहीं बल्कि खुद को आगे आना चाहिए तब शायद आभास होगा कि किसी सामाजिक संगठन के संचालन में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उनका भी अभिप्राय केवल गौवंश की सेवा की आड़ में राजनीति करना है और कही न कही निजी हितों का टकराव या निजी खीज निकालने का मात्र एक सुनियोजित प्रोपेगेंडा है। आखिर क्यों नहीं सड़कों पर घूम रहे बेसहारा गौवंश के लिए सोशल मिडिया पर अभियान चलाया जाए। राजनीतिक दलों ने तो अपनी राजनीति चमकाने के लिए गौवंश को ढाल बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया। अब सामाजिक संगठनो व समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने भी शायद उसी परिपाटी का अनुसरण करते हुए गौवंश की आड़ में अपने निजी हितों की पूर्ती करने में लगे हुए हैं। गौवंश को लेकर कथित प्रेम को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि गौवंश केवल राजनीतिक व स्वार्थ सिद्धि का मोहरा बनकर रह गया है।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!