मर चुकी है संवेदनाएं, कौन वेदना को समझता है। घाव देखकर लोग हंस रहे, कौन मरहम सहेजता है।।
दुर्घटना के बनाए जाते है वीडियो, कौन एंबुलेंस बुलाने की सोचता है। वीडियो वायरल करने की है जल्दी, कौन उनके घर वालों को खोजता है।।
लग रही है आग किसी के आशियाने में, कौन बुझाने की सोचता है। टांग खींचने वालों की नहीं है कमी, कौन साथ देने की सोचता है।।
लगता है सारे कुओं में भांग पड़ गई, कौन बात नैतिकता की सोचता है। आओ अनमोल कुछ ऐसा प्रयास करें, एक दूसरे को देखकर हो खुशी, हर चेहरे पर खुशी उल्लास का रंग भरे।।