धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
By -
0


दादू पीवै पिलावै रामरस, प्रेम भक्ति गुण गाइ। नित प्रति कथा हरि की करै, हेत सहित ल्यौ लाइ। संत शिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि महात्माओं के सत्संग में प्रायः भगवान की मुख्य चर्चा हुआ करती है न कि राजकथा और जगतकथा। अतः साधु समागम से अपने मन बुद्धि को निगृहीत करके भगवत कथा रस का ही साधक को पान करना चाहिए। श्रीमद्भागवत में इस संसार में भ्रमण करते हुए जीव को जब भगवत प्रेमी भक्तों का समागम प्राप्त होता है तभी सत्संगति प्राप्त होती है। सत्संगति से उसी समय सद्गति तथा परावर परमात्मा में बुद्धि लग जाती है। जडभरत वाक्यम में सत्पुरुषों के चरणों की रज से अपने को स्नान कराये बिना तप, यज्ञ, वैदिक कर्म, अन्न आदि का दान, अतिथि सेवा, दीन सेवा आदि धर्मानुष्ठान, वेदाध्ययन अथवा जल, अग्नि या सूर्य की उपासना आदि किसी भी साधन से यह परमात्मा का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। कारण यह है कि महापुरुषों के समीप सदा पवित्र कीर्ति श्रीहरि के गुणानुवाद चलते रहते हैं। जिसमें विषयवार्ता तो पास में भी नहीं आ सकती और जब भगवतकथा का नित्य पान किया जाता है तब वह मुमुक्षु पुरुष की शुद्ध बुद्धि को भगवान वासुदेव में लगा देती है।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!