यह सर्वविदित है कि देश में हर साल मानसून के दौरान विभिन्न राज्यों के सरकारी स्कूल भवनों की जर्जर अवस्था के कारण होने वाली दुर्घटनाओं मेँ बच्चों की मौत हो जाती है लेकिन उसे कोई नोटिस नहीं लेता और उनकी आवाज नक्कारखाने मेँ तूती की आवाज बनकर रह जाती है लेकिन इस बार सजग मीडिया ने अपनी सार्थक भूमिका निभाकर पूरे देश को जगा दिया। हाल ही झालावाड़ के सरकारी स्कूल की दुखांतिका ने मीडिया की सजगता के कारण सम्पूर्ण राष्ट्र का ध्यान खींचा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर ना केवल राज्य के मुख्यमंत्री भजन लाल को उद्वेलित कर दिया बल्कि सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस गंभीर विषय पर सोचने पर विवश कर दिया। यह कोई साधारण घटना नहीं है क्योंकि सरकारी स्कूलों मेँ अक्सर गरीब, मध्य वित्त एवं निम्न मध्य वित्त परिवारों के ही बच्चे पढ़ते हैं। आमतौर पर ऐसी दुर्घटनाएँ होने के बाद सरकार कम ही चेतती है। ये मुद्दा केवल राजस्थान के झालावाड़ के सरकारी स्कूलों तक ही सीमित नहीं बल्कि राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसकी अनदेखी होती रही लेकिन अब और नहीं। पूरे देश में इसे लेकर गहरी चिंता है। गौरतलब है कि एक अनुमान के अनुसार देश मेँ 54,000 से अधिक सरकारी स्कूल जर्जर हालत में हैं। इन स्कूलों में लाखों बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ाई कर रहे हैं। ओडिशा में 12,343, महाराष्ट्र में 8.071, पश्चिम बंगाल में 4,269, गुजरात में 3,857, आंध्र प्रदेश में 2,789, मध्यप्रदेश में 2,659, उत्तर प्रदेश में 2,238 और राजस्थान में 2,061 स्कूल बुरी हालत में हैं।
ऐसा नहीं है कि हमारे जन प्रतिनिधि इससे बेखबर हैं लेकिन शासन इसे गंभीरता से लेता ही नहीं। राजस्थान विधानसभा में कई विधायकों ने सरकारी स्कूलों के जर्जर भवनों और उनकी मरम्मत से जुड़े सवाल समय समय पर लगाए लेकिन इन सवालों के जवाब शिक्षा विभाग की ओर से नहीं दिए गए। जानकारी के मुताबिक, जनवरी से मार्च 2025 तक चले विधानसभा के तीसरे सत्र के दौरान आठ विधायकों ने तारांकित सवाल लगाए, लेकिन एक भी सवाल का जवाब विभाग की ओर से नहीं दिया गया। शिक्षा विभाग की ओर से विधायकों द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब नहीं दिया जाना भी हैरान जनक है। इसे विभागीय अधिकारियों की अकर्मण्यता ही माना जाए तो गलत नहीं होगा।
ऐसी दुखांतिकाओं के बाद जनता का गुस्सा फूटना स्वाभाविक है। झालावाड़ के पिपलोदी गांव में स्कूल की छत गिरने से हुए हादसे के बाद प्रदेश भर में आक्रोश है। रामगंज मंडी क्षेत्र के गोवर्धनपुरा और निमाना गांव में ग्रामीणों ने अपने-अपने सरकारी स्कूलों पर ताले जड़ दिए और बच्चों को छुट्टी देकर घर भेज दिया। ग्रामीणों ने बताया कि स्कूल भवनों की मरम्मत नहीं हो जाती, तब तक वे अपने बच्चों को इन खतरनाक इमारतों में नहीं भेजेंगे। ऐसा ही आक्रोश कमोबेश अन्य स्थानों पर भी देखने को मिला। बरसात के दौरान अनेक स्कूलों की छत से पानी टपकता है और सरिया तक बाहर नजर आने लगता है।ग्रामीणों का तर्क था कि 50 साल पुराना भवन आज भी बेहतर स्थिति में है, जबकि महज 5 साल पहले बना नया भवन पूरी तरह जर्जर हो गया है। इससे यह स्पष्ट है कि निर्माण कार्य में घोटाला और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। ऐसे मेँ बच्चों के जीवन से खिलवाड़ के मद्देनज़र निर्माण कार्यों मेँ हुए घोटाले और भ्रष्टाचार की जांच की जानी चाहिए। दूसरी ओर इसे शुभ संकेत माना जा सकता है कि झालावाड़ में स्कूल भवन गिरने से हुई सात बच्चों की दर्दनाक मौत के बाद सरकार ने राज्यभर के पुराने स्कूल भवनों की जांच और मरम्मत के आदेश दिए हैं। यह कहना होगा कि स्कूलों की ओर से भेजे जाने वाले मरम्मत प्रस्तावों पर यथासमय बजट आवंटित नहीं किया जाता या फिर ऐसे बजट की राशि अन्य मदों मेँ खर्च कर दी जाती है। स्कूलों के जर्जर स्थिति की जानकारी संबंधित अधिकारियों के अलावा जनप्रतिनिधियों को भी है लेकिन वे कुछ करना नहीं चाह रहे हैं। अधिकांश स्कूल पिछले 3 से 5 साल तक जर्जर स्थिति में है लेकिन अब तक स्थिति जस की तस है। हकीकत है कि स्कूल भवन को ठीक नहीं किया जाता केवल ठीक करने की औपचारिकता ही निभाई जाती है। जनप्रतिनिधि भी आरोप प्रत्यारोप लगाकर शांत हो जाते हैं। सरकार की ओर से हर साल प्रवेशोत्सव और नामांकन बढ़ाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं किन्तु स्कूलों की जर्जर अवस्था इस अभियान में सबसे बड़ा रोड़ा है। इस कारण अनेक स्कूलों में पिछले सालों में नामांकन 30 से 50 प्रतिशत से भी कम रह गया है। एक जानकारी के अनुसार दो साल के अंदर सरकार ने 600 स्कूलों की मरम्मत के लिए 1500 करोड़ रुपये दिए, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर कब तक जर्जर स्कूलों में डर के साए में बच्चे स्कूलों में पढ़ते रहेंगे ? एक मोटे अनुमान के अनुसार राजस्थान के 8000 सरकारी स्कूल जर्जर, डर के साये और मरम्मत के इंतजार में हैं। यहां नौनिहालों का भविष्य बल्लियों पर टिका हुआ है। पड़ोसी राज्य के स्कूलों का हाल भी कमोबेश यही है। वहाँ 5600 भवन जर्जर, 67 हजार में फर्नीचर और 15 हजार विद्यालयों में बिजली तक नहीं है। मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों की हालत बेहद खराब है। राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 92,032 सरकारी स्कूल संचालित हो रहे हैं, जिनमें से 5,600 स्कूलों के भवन पूरी तरह जर्जर हैं और 81,568 क्लास रूम खस्ताहाल अवस्था में हैं। यह आंकड़े राज्य की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलते हैं।
उत्तराखंड प्रदेश के विभिन्न जनपदों में साढ़े छह सौ से ज्यादा प्राथमिक विद्यालय भवन व नौ सौ माध्यमिक विद्यालय भवन बहुत ही जर्जर हालत में हैं और विशेष तौर पर बरसातों में इनकी स्थिति और खतरनाक हो जाती है और किसी भी दिन राजस्थान के झालावाड़ के पिपलोदी गांव जैसा भयंकर हादसा घटित हो सकता है।
ऐसे में केन्द्र और राज्यों को कोई ठोस नीति बनाकर इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान करना चाहिए और देश के अधिसंख्य गरीब एवं मध्य वित्त परिवारों के नौनिहालों के जीवन को सुरक्षित करने पर विचार करना चाहिए । इसके साथ ही सजग मीडिया को इस दिशा मे निरंतर फोलोअप करते रहना चाहिए।