अनंता में छिपे है अनेक नौकरशाह के राज: एसीबी ऑपरेशन कल से आएगा हरकत में

AYUSH ANTIMA
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जयपुर: राजस्थान में शिखर अग्रवाल प्रकरण अब एक बड़े प्रशासनिक और कारोबारी विवाद का रूप लेता जा रहा है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) कल से सक्रिय होकर इस प्रकरण की विस्तृत जांच प्रारंभ करने जा रहा है। जांच की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भूपेंद्र कुमार को सौंपी गई है, जो डीआईजी ओमप्रकाश मीणा के निर्देशन में कार्रवाई करेंगे। सूत्रों के अनुसार, जांच के पहले चरण में विभिन्न सरकारी विभागों से दस्तावेज जुटाए जाएंगे। इनमें भूमि आवंटन, स्वीकृति आदेश, निर्माण अनुमतियां, राजस्व रिकॉर्ड, सरकारी रियायतें, वित्तीय लेनदेन और परियोजनाओं से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण अभिलेख शामिल होंगे। दस्तावेजों की पड़ताल के बाद जांच दल संबंधित परिसरों का दौरा भी कर सकता है। अजबगढ़, बुझड़ा (उदयपुर), करजत (महाराष्ट्र), दामोदरा (जैसलमेर), सरिस्का, पुष्कर, रणथम्भौर और जयपुर स्थित अनंता समूह के रिसॉर्ट और अन्य परिसरों की जांच संभावित है। यहां जमीन के वास्तविक उपयोग, स्वीकृत क्षेत्रफल, निर्मित निर्माण, विला की बिक्री और सरकारी अनुमतियों की वास्तविक स्थिति की पड़ताल की जा सकती है। इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली जानकारी यह सामने आ रही है कि नगरीय विकास विभाग से जुड़े एक आला अधिकारी सहित डेढ़ दर्जन से ज्यादा ऐसे अधिकारी हैं, जिनके परिजनों ने अनंता की विभिन्न परियोजनाओं में रिसॉर्ट अथवा विला खरीद रखे हैं। सूत्रों के मुताबिक, कुछ अधिकारियों को कथित तौर पर उपहारस्वरूप भी विला दिए जाने की चर्चा है। यदि ये जानकारियां दस्तावेजों से प्रमाणित होती हैं तो मामला केवल संपत्तियों की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा। सरकारी पदों पर बैठे अधिकारियों और निजी कारोबारी समूह के बीच संभावित हितों के टकराव का गंभीर सवाल खड़ा होगा। एसीबी को यह पता लगाना होगा कि इन संपत्तियों की खरीद के लिए भुगतान किसने किया, धन का स्रोत क्या था, संपत्तियां अधिकारियों के परिजनों के नाम क्यों खरीदी गई। क्या संबंधित अधिकारी उस समय उन विभागों में पदस्थ थे, जहां अनंता समूह की परियोजनाओं से जुड़ी फाइलें विचाराधीन थीं और सबसे महत्वपूर्ण कि क्या किसी अधिकारी को बिना उचित प्रतिफल के विला अथवा अन्य आर्थिक लाभ मिला। इन सवालों के जवाब संपत्तियों की रजिस्ट्रियों, बैंक खातों, आयकर विवरणियों और सरकारी अधिकारियों की संपत्ति घोषणाओं के मिलान से ही मिल सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि जांच के दौरान विभिन्न रिसॉर्ट और विला के कर्मचारियों के अलावा गोयल फैशन्स के निदेशक संजय गोयल, शिखर अग्रवाल, उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर, मंगलम ग्रुप के निदेशकों तथा प्रकरण से जुड़े अन्य निजी व्यक्तियों और सरकारी अधिकारियों से भी पूछताछ की जा सकती है। जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी होगा कि विभिन्न परियोजनाओं को सरकारी स्वीकृतियां किन परिस्थितियों में मिलीं। किन अधिकारियों ने फाइलों पर निर्णय किए, नियमों में छूट किस आधार पर दी गई, जमीनों के उपयोग और निर्माण अनुमतियों में कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं हुई, सरकारी निर्णयों से किन निजी कारोबारियों को लाभ पहुंचा। अजबगढ़ से लेकर उदयपुर, जैसलमेर, महाराष्ट्र और रणथम्भौर तक फैली अनंता की परियोजनाओं की जांच अपने आप में महत्वपूर्ण है। अलग-अलग स्थानों पर भूमि की प्रकृति, स्वामित्व, स्वीकृतियां और निर्माण की स्थिति का मिलान करना होगा। विशेष रूप से यह देखना होगा कि कहीं एक ही कारोबारी समूह को अलग-अलग स्थानों पर नियमों से परे जाकर सुविधाएं तो उपलब्ध नहीं कराई गई। क्या सरकारी जमीन, राजस्व भूमि अथवा अन्य श्रेणी की जमीनों के उपयोग में कोई अनियमितता हुई, क्या स्वीकृत निर्माण और मौके पर मौजूद निर्माण में अंतर है। यदि एसीबी ने सभी परियोजनाओं को एक साझा कारोबारी और प्रशासनिक नेटवर्क के रूप में देखा तो जांच का दायरा काफी व्यापक हो सकता है। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में कथित कानपुर लॉबी की भूमिका भी जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू बन सकती है। यदि विभिन्न परियोजनाओं की स्वीकृतियों, प्रशासनिक फैसलों और निजी कारोबारी हितों के बीच संबंध सामने आते हैं तो कई वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल आवश्यक हो सकती है। डेढ़ दर्जन से अधिक अधिकारियों के परिजनों की संपत्तियों और उपहार में विला मिलने की चर्चाओं की पुष्टि होने पर जांच का स्वरूप और व्यापक हो सकता है। हालांकि, किसी अधिकारी या कारोबारी की संलिप्तता अभी जांच का विषय है, स्थापित तथ्य नहीं। इस प्रकरण में एसीबी की असली परीक्षा यह होगी कि जांच केवल कुछ व्यक्तियों की पूछताछ और औपचारिक दस्तावेजी कार्रवाई तक सीमित रहती है या सरकारी फैसलों से लेकर निजी लाभार्थियों तक प्रत्येक कड़ी की पड़ताल की जाती है। जांच एजेंसी को यह पता लगाना होगा कि जमीन किसने उपलब्ध कराई, स्वीकृतियां किसने दीं, नियमों में छूट किसने प्रदान की, किस अधिकारी ने किस फाइल पर निर्णय किया और अंततः इन फैसलों से किसे आर्थिक लाभ मिला। यदि जांच विस्तृत, निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के हुई तो अनंता प्रकरण राजस्थान के प्रशासनिक और कारोबारी गलियारों से जुड़े कई ऐसे चेहरों को बेनकाब कर सकता है, जिनकी भूमिका अब तक पर्दे के पीछे रही है। अब निगाहें एसीबी पर हैं। सवाल सिर्फ शिखर अग्रवाल तक पहुंचने का नहीं, बल्कि उस पूरे कथित प्रशासनिक और कारोबारी नेटवर्क की जवाबदेही तय करने का है, जिसके तार कई विभागों, अधिकारियों और निजी समूहों तक जुड़े होने की आशंका जताई जा रही है। क्या एसीबी वास्तव में पूरे नेटवर्क की परतें खोलेगी या जांच की आंच कुछ चुनिंदा चेहरों तक ही सीमित रह जाएगी ये आने वाले दिन इस सवाल का जवाब देंगे। ‎<This message was edited>

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