पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) को सबसे पवित्र महीनों में से एक माना गया है। पुरुषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष का अपना एक विशेष और गहरा धार्मिक महत्व है, इस पवित्र महीने के कृष्ण पक्ष का पितरों (पूर्वजों) से बहुत गहरा संबंध है। कृष्ण पक्ष का समय आत्म-शुद्धि और पितरों को तृप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अधिक मास के कृष्ण पक्ष में किए गए तर्पण, श्राद्ध और दान से पूर्वज अत्यंत प्रसन्न होते हैं और वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पुरुषोत्तम मास में जब कृष्ण पक्ष आता है, तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस समय चंद्रमा की कलाएं घटती हैं, जिसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अहंकार, नकारात्मकता और विकारों को घटाने का प्रतीक माना जाता है। इस पक्ष में भगवान श्री कृष्ण और नारायण की भक्ति करने से साधक के अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त होती है। कृष्ण पक्ष का स्वामी चंद्रमा को माना गया है, और चंद्रमा का सीधा संबंध हमारे मन और पितृलोक से है। अधिक मास में जब सूर्य और चंद्रमा के बीच का संतुलन बदलता है, तो ब्रह्मांड में एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का निर्माण होता है। इस दौरान किए गए उपाय सीधे पितरों तक पहुँचते हैं। यदि किसी जातक की कुंडली में 'पितृ दोष' है, जिस जातक की कुंडली में राहु/केतु पंचम या अष्टम भाव में स्थित हो या सूर्य के साथ युति कर रहे हो तो जातक को पितृ दोष की प्राप्ति होती है। जिसके कारण उसकी तरक्की रुक जाती है, विवाह होने में बाधा, संतान प्राप्ति में रुकावट या परिवार में कलह जैसी स्थिति बन जाती है तो अधिक मास का कृष्ण पक्ष उस दोष को शांत करने का स्वर्णिम अवसर है।
पितरों के प्रसन्न होने से घर में संतान सुख प्राप्त होता है और आने वाली पीढ़ियां संस्कारी व दीर्घायु होती हैं। कई बार कड़ी मेहनत के बाद भी व्यापार या नौकरी में सफलता नहीं मिलती। पितृ दोष शांत होने से तरक्की के रास्ते तुरंत खुल जाते हैं। पूर्वजों के आशीर्वाद से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, जिससे मानसिक तनाव दूर होता है और आर्थिक तंगी से राहत मिलती है। पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) में प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल, गंगाजल, काला तिल और जौ मिलाकर दक्षिण पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित (तर्पण) करें। इस पक्ष में किए जाने वाले दान में काले तिल और कुशा (एक प्रकार की घास) का प्रयोग अवश्य करें, इससे पितर तृप्त होते हैं। रोज शाम को घर के दक्षिण कोने में या पीपल के पेड़ के नीचे पितरों के निमित्त सरसों के तेल का दीपक जलाएं। दक्षिण पश्चिम दिशा को पितरों की दिशा माना गया है। भोजन बनाते समय पहली पांच रोटियां क्रमशः गाय, कुत्ते, कौए, देवादि और चींटियों के लिए निकालें। कौए को पितरों का रूप माना जाता है, इसलिए उन्हें भोजन कराना अत्यंत शुभ है। श्रीमद्भागवत महापुराण में पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए धुंधुकारी की कथा और मुख्य ग्रंथ का एकादश स्कंध 11वां भाग व द्वादश स्कंध 12वां भाग सुनना सबसे उत्तम माना गया है। इस पक्ष में हर शाम तुलसी के पौधे के पास और घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक अवश्य जलाएं। पीले वस्त्र, अनाज (गेहूं, चावल), घी और तांबे के बर्तनों का दान अत्यंत फलदायी माना गया है। इस महीने को 'पुण्य का बोनस महीना' कहा जा सकता है। सामान्य दिनों में की गई पूजा का जो फल मिलता है, पुरुषोत्तम मास में वही पूजा करने से अक्षय पुण्य (जो कभी खत्म न हो) मिलता है। लोग अपने जीवन के पापों को मिटाने और सौभाग्य को जगाने के लिए इस समय व्रत, उपवास और दीपदान करते हैं। भगवान विष्णु ने इस महीने को अपना सबसे प्रिय नाम 'पुरुषोत्तम' दिया और वरदान दिया, "जो भी इस महीने में मेरी भक्ति, पूजा, जप या दान करेगा, उसे अन्य महीनों की तुलना में करोड़ों गुना अधिक फल मिलेगा। इस महीने में किए गए सत्कर्म कभी निष्फल नहीं होंगे। "पुरुषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष का स्वामी चंद्रमा है, जिसका सीधा संबंध हमारे मन और पितृलोक से है। यदि किसी जातक की कुंडली में 'पितृ दोष' है, जिसके कारण तरक्की रुकी हुई है, विवाह में बाधा आ रही है या परिवार में बीमारी रहती है, तो अधिकमास का कृष्ण पक्ष उस दोष को शांत करने का स्वर्णिम अवसर है। इस दौरान पूरी श्रीमद्भागवत महापुराण या विशेष रूप से इसके 'माहात्म्य' में वर्णित 'धुंधुकारी की मोक्ष कथा' का श्रवण करने से भयंकर से भयंकर प्रेत योनि में फंसे पूर्वज भी तुरंत मुक्त हो जाते हैं। पितरों के निमित्त श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे, सातवें या ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना भी सीधे वैकुंठ लोक की प्राप्ति कराता है।"