नेहरू काल 1947-1964 में भारतीय संसद की मर्यादा अपने उच्चतम स्तर पर थी, जिसे संसदीय लोकतंत्र मे स्वर्ण युग के रूप में याद किया जाता है। नेहरु का मानना था कि संसद देश की सर्वोच्च संस्था है और इसकी गरिमा बनाए रखने में सभी सांसदों का योगदान रहता है। नेहरू अपने धुर विरोधी व विपक्षी नेताओं के प्रति गहरा सम्मान रखते थे। आचार्य कृपलानी जैसे धुर विरोधी को भी संसद में बोलने का पूरा समय देते थे। उनका सम्मान बरकरार रखने के लिए एक पत्रकार को, जिसने कृपलानी जी के बारे में गलत लिख दिया था, उसको संसद में बुलाकर कड़ी निंदा की थी। लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद का स्थान होता है लेकिन नेहरू के भाषण व्यक्तिगत टिप्पणी व बदजुबानी से मुक्त होते थे। नेहरू स्वयं अक्सर संसद में उपस्थित रहते थे व विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते थे। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष की स्वायत्तता का हमेशा सम्मान किया। 1954 में जब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया, तो नेहरु ने कांग्रेसी सांसदों को व्हिप से मुक्त कर दिया ताकि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार वोट कर सके। नेहरू के कार्यकाल में संसद एक बहस का मंच न होकर संवाद का केन्द्र थी।
आधुनिक परिवेश में यदि संसदीय प्रणाली को देखे तो अमर्यादित, असंसदीय व व्यक्तिगत टिप्पणी के चलते यह बहस का गंभीर विषय है। 2021-2022 में प्रतिबंधित शब्द जुमलाजीवी, बाल बुध्दि, शकुनी, जयचंद, चांडाल चौकड़ी, गद्दार, घड़ियाली आंसू, कमीना, दलाल, खून की खेती, छोकरा, कोयल चोर, गौरू चोर और तानाशाही जैसे शब्दों पर रोक लगाई थी। इन शब्दों को प्रतिबंधित करने का उद्देश्य संसद की कार्रवाई को मर्यादित रखना और लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखना था लेकिन आधुनिक संसद सत्ता पक्ष व विपक्ष की तरफ से अमर्यादित शब्दों की प्रयोगशाला बन गई है। इसमें पक्ष और विपक्ष दोनों ही जिम्मेदार है। विपक्ष व लोकसभा में विपक्ष के नेता ने इस पद की गरिमा को तार तार कर दिया, जिसको अटल बिहारी वाजपेई ने अपने कार्यकाल में उच्चतम आयाम स्थापित किए थे। आज की संसदीय बहस में पक्ष व विपक्ष दोनो ही जिम्मेदार है, किस संसदीय प्रणाली से हम कौनसी संसदीय प्रणाली तक पहुंच गये, जहां साला शब्द भी संसदीय प्रणाली का हिस्सा बन गया। जो सांसद अपने फिल्मी कैरियर में ऐसे सीन देने से परहेज़ नहीं करती थी, जिनको परिवार के साथ देखना मुश्किल था, वहीं सांसद आज विपक्ष के नेता को देखकर असहज महसूस करती है। अतः सांसदों को अपनी भाषाई सुचिता को ध्यान में रखते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था को इस तरह बनाए कि मतदाता भी गर्व कर सकें कि हमने बढ़िया सांसद का चुनाव किया है।