दादू मोह संसार कौ, बिहरै तन मन प्राण। दादू छूटै ज्ञान करि, को साधू सन्त सुजाण।। संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज कहते हैं कि संसार का मोह शरीर मन प्राण इन सबको दुःखी करता है। कोई ज्ञानी पुरुष ही ज्ञान द्वारा मोह को त्याग सकता है अन्य नहीं। कुटुम्ब की चिंता वाले जीव के कुल, शील तथा गुण शरीर के साथ ही नष्ट हो जाते हैं। जैसे मिट्टी के कच्चे घड़े में भरा हुआ पानी घड़े के साथ ही नष्ट हो जाता हैं। उक्त वासिष्ठे यह जीव जन्म, मृत्यु ,जरा आदि दुःखों से दुःखित होता हुआ भी सावधान नहीं होता। जो हितकारक नहीं है, उनको ही हित मान रहा है, जो सत्य नहीं है, उनको सत्य मान रहा है किंतु सचेत नहीं होता। महाभारत में लिखा है कि तेरे मरने के बाद तेरे पीछे चलने वाला कोई भी नहीं है किंतु हे जीव तेरे पाप पुण्य ही साथ जाएंगे। तेरे मरने पर तो भाई बंधु कुछ दूर जाकर वापस लौट आएंगे। तेरे हजारों माता पिता पुत्र हुए हैं और आगे भी होने वाले हैं, तुम ही बताओ तुम किसके हो। मैं एक हूं, मेरा कोई भी नहीं है। मैं भी किसी दूसरे का नहीं हूं। मैं ऐसा किसी को भी नहीं देख रहा हूं कि जिससे मैं उसका बन जाऊं या वह मेरा बन जाए। इसलिए सब कुछ त्यागकर तथा आशा रहित होकर परिग्रह से रहित होकर रहो, जिसने सब कुछ त्याग दिया वही विद्वान है।
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