बदलाव प्रकृति का नियम

AYUSH ANTIMA
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दुनिया में कोई भी चीज स्थाई नहीं है। मौसम, जीवन, सामाजिक व्यवस्था व राजनीत हर चीज लगातार बदलती रहती है। हर परिवर्तन को हमें स्वीकार करना चाहिए क्योंकि परिवर्तन के बिना किसी भी क्षेत्र में विकास संभव नहीं है। परिवर्तन को स्वीकार न करना निराशा व कुंठा को जन्म देता है। परिवर्तन का विरोध करने के बजाय उससे तालमेल बिठाना चाहिए। यदि राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव की बात करें तो संगठनात्मक बदलाव बेहद जरूरी है क्योंकि संगठनात्मक बदलाव दल को प्रसांगिक बनाए रखता है। बदलती जनता की अपेक्षाओं व चुनौतियों का सामना करने के लिए बदलाव जरुरी होता है लेकिन यह बदलाव नेतृत्व, निर्णय लेने की प्रकिया, विचारधारा और जनता से जुड़ने के तरीकों में होना चाहिए ताकि दल एकजुट रहकर जनता का विश्वास जीत सके। किसी भी राजनीतिक दल के लिए मजबूत व एकजुट संगठन चुनावी ताकत होते, अंदरूनी मतभेद और कमजोर संगठन हार का कारण बनते हैं। यदि उपरोक्त तथ्यों को भाजपा झुन्झुनू जिले के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव के रूप में देखे तो जो कार्यकारिणी को लेकर अंतर्विरोध हो रहे हैं, वह भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकते। जो नेता सालों से संगठन पर कुंडली मारे बैठे थे, उनको मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के मुख्यमंत्री के मनोनयन को ध्यान में रखना होगा कि पहली बार के विधायक बने भजन लाल शर्मा को राजस्थान की बागडोर सौंप दी व पुराने व कद्दावर नेता मुंह ताकते रह गये। जिस तरह से भाजपा कार्यकारिणी को लेकर पुराने नेता खुद की दावेदारी व नाम न आने से दुखी हैं, उनको भजन लाल शर्मा का मुख्यमंत्री बनने वाला एपीसोड याद करना होगा कि पर्ची आते ही राजस्थान की कद्दावर व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी हतप्रभ रह गई और इस परिवर्तन को दबे व अनमने मन से स्वीकार करना पड़ा। झुंझुनूं जिले के नेता जो विरोध कर रहे हैं क्या उनका राजनीतिक कद वसुंधरा राजे से बड़ा है। जब बदलाव या परिवर्तन को लेकर उनको दरकिनार कर दिया गया तो समझना होगा कि कुंडली संस्कृति अब चलने वाली नहीं।

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