काहू तेरा मरम न जाना रे, सब भये दीवाना रे॥ माया के रस राते माते,जगत भुलाना रे, को काहू का कह्या न मानें, भये अयाना रे॥ माया मोहे मुदित मगन, खान खाना रे, विषया रस अरस परस, साच ठाना रे।। आदि अन्त जीव कीया पयाना रे, दादू सब भरम भूले, देख दाना रे।। अर्थात हे प्रभो ! आपके इस रहस्यमय स्वरूप को इस संसार में कोई भी प्राणी नहीं जान सकता। सभी जगत् के प्राणी विषय रस में डूबे हुए पागल होकर भगवान् को भी भूल गये हैं। कोई किसी के ज्ञान की बात को भी नहीं सुनता, किन्तु माया से मोहित हुए विषय-रस का पान करके प्रसन्न मन से अपने आपको ही श्रेष्ठ बतलाते हैं। उसी विषय-रस में डूबे हुए उसी को सत्य मानकर जगत् में भ्रमण कर रहे हैं। जन्म जन्मान्तरों तक उसी विषय-रस के लिये ही दौड़ते रहते हैं। अधिक क्या कहूं, बुद्धिमान् मनुष्य भी उस विषय रस को देख कर भगवान् को भूल जाते हैं।
योगवासिष्ठ में कहा है कि इस संसार में क्या सुख है, कुछ भी नहीं, क्योंकि इसमें जो जीव पैदा होता है, वह मरने के लिये ही पैदा होता है। जो मरते हैं, वे जन्मने के लिये ही मरते हैं। चर-अचर प्राणियों की चेष्टा के विषय तथा केवल वैभव काल में रहने वाले ये जितने भोग के साधनभूत पदार्थ हैं, वे सब के सब क्षण-भङ्गुर हैं और विपत्ति में डालने वाले पाप रूपी हैं। मृगतृष्णा के पानी की तरह मूढ बुद्धि वाले लोग संसार के पदार्थों में सुख न होने पर भी उनमें सुख मान बैठते हैं। उनके लोभ से आकृष्ट होकर इधर-उधर मृग की तरह संसार-वन में भटकते रहते हैं। यहां पर लोग किसी के द्वारा बेचे नहीं गये हैं, फिर भी बेचे हुए की तरह परवश हो रहे हैं। इस बात को जानते हुए भी कि यह सब माया का खेल है, फिर भी हम सब मूढ बने बैठे हैं, इन सब से मुक्त होने का कोई प्रयल ही नहीं करते। यह कितने खेद की बात है ।